
1 अक्टूबर 1919 को सुल्तानपुर (संयुक्त प्रांत आगरा और अवध, ब्रिटिश भारत, अब उत्तर प्रदेश) में मजरूह सुल्तानपुरी (अस्रार-उल-हसन खान) का जन्म हुआ। मजरूह सुल्तानपुरी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के प्रमुख, काबिल, लोकप्रिय उर्दू कवि और गीतकार बने। प्रगतिशील सोच के मजरूह सुल्तानपुरी प्रोग्रेसिव राइटर्स मूवमेंट (प्रगतिशील लेखक संघ) के अहम सदस्य थे। उन्हें 20वीं सदी के साहित्य के बेहतरीन और नए विचारों वाले उर्दू कवियों में से एक माना जाता है। फैज अहमद फैज और खुमार बाराबंकवी के साथ-साथ मजरूह को भी सबसे बेहतरीन गजलकारों में से एक माना जाता है। मजरूह को 1965 में फिल्म दोस्ती के गाने चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे के लिए एकमात्र फिल्मफेयर बेस्ट लिरिसिस्ट (सर्वश्रेष्ठ गीतकार) अवॉर्ड मिला। उन्हें 1993 में दादा साहब फाल्के अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया और मजरूह सुल्तानपुरी यह प्रतिष्ठित अवॉर्ड पाने वाले पहले गीतकार बने। जब मजरूह सुल्तानपुरी जाने-माने गीतकार और लेखक के तौर पर स्थापित हो रहे थे तब #MajroohSultanpuri वामपंथी विचारधारा के कारण वे मुश्किल में पड़ गए। सरकार की आलोचना करने पर 1949 में बलराज साहनी जैसे अन्य वामपंथियों के साथ मजरूह सुल्तानपुरी को भी जेल भेज दिया गया। मजरूह की गिरफ्तारी 1948 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया की दूसरी कांग्रेस के बाद कम्युनिस्टों की देशव्यापी गिरफ्तारी के दौरान हुई थी जिसमें कम्युनिस्टों ने भारतीय सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ने का ऐलान किया था। मजरूह से माफी मांगने को कहा गया, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया और उन्हें दो साल की जेल की सजा सुनाई गई।
यहां पेश है मजरूह सुल्तानपुरी का 1959 में बनी फिल्म काली टोपी लाल रुमाल के लिए लिखा गया एक गीत, दीवाना आदमी को बनाती हैं रोटियां और कुछ चुनिंदा शेर
दीवाना आदमी को बनाती हैं रोटियाँ
खुद नाचती हैं सबको नचाती हैं रोटियाँ
बूढ़ा चलाए ठेले को फाकों से झूल के
बच्चा उठाए बोझ खिलौनों को भूल के
देखा न जाए जो सो दिखाती हैं रोटियाँ
बैठी है जो चेहरे पे मल के जिगर का खूं
दुनिया बुरा कहे इन्हें पर मैं तो ये कहूँ
कोठे पे बैठ आँख लड़ाती हैं रोटियाँ
कहता था इक फकीर कि रखना जरा नजर
रोटी को आदमी ही नहीं खाते बेखबर
अक्सर तो आदमी को खाती हैं रोटियाँ
तुझको पते की बात बताऊँ मैं जान-ए-मन
क्यूँ चाँद पर पहुँचने की इन्सां को है लगन
इन्सां को चाँद में नजर आती हैं रोटियाँ
दीवाना आदमी को बनाती हैं रोटियाँ …
मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंजिल मगर
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया
ऐसे हँस हँस के न देखा करो सब की जानिब
लोग ऐसी ही अदाओं पे फिदा होते हैं
देख जिंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार
रक्स करना है तो फिर पाँव की जंजीर न देख
कोई हम-दम न रहा कोई सहारा न रहा
हम किसी के न रहे कोई हमारा न रहा
शब-ए-इंतिजार की कश्मकश में न पूछ कैसे सहर हुई
कभी इक चराग जला दिया कभी इक चराग बुझा दिया
जफा के जिक्र पे तुम क्यूँ सँभल के बैठ गए
तुम्हारी बात नहीं बात है जमाने की
गम-ए-हयात ने आवारा कर दिया वर्ना
थी आरजू कि तिरे दर पे सुब्ह ओ शाम करें
बहाने और भी होते जो जिंदगी के लिए
हम एक बार तिरी आरजू भी खो देते
बचा लिया मुझे तूफाँ की मौज ने वर्ना
किनारे वाले सफीना मिरा डुबो देते
सुतून-ए-दार पे रखते चलो सरों के चराग
जहाँ तलक ये सितम की सियाह रात चले
जबाँ हमारी न समझा यहाँ कोई मजरूह
हम अजनबी की तरह अपने ही वतन में रहे
अलग बैठे थे फिर भी आँख साकी की पड़ी हम पर
अगर है तिश्नगी कामिल तो पैमाने भी आएँगे
रोक सकता हमें जिंदान-ए-बला क्या मजरूह
हम तो आवाज हैं दीवार से छन जाते हैं
मुझ से कहा जिब्रील-ए-जुनूँ ने ये भी वही-ए-इलाही है
मजहब तो बस मजहब-ए-दिल है बाकी सब गुमराही है
हम को जुनूँ क्या सिखलाते हो हम थे परेशाँ तुम से जियादा
चाक किए हैं हम ने अजीजो चार गरेबाँ तुम से जियादा
मुझे ये फिक्र सब की प्यास अपनी प्यास है साकी
तुझे ये जिद कि खाली है मिरा पैमाना बरसों से
सर पर हवा-ए-जुल्म चले सौ जतन के साथ
अपनी कुलाह कज है उसी बाँकपन के साथ
अब कारगह-ए-दहर में लगता है बहुत दिल
ऐ दोस्त कहीं ये भी तिरा गम तो नहीं है
मेरे ही संग-ओ-खिश्त से तामीर-ए-बाम-ओ-दर
मेरे ही घर को शहर में शामिल कहा न जाए
पारा-ए-दिल है वतन की सरजमीं मुश्किल ये है
शहर को वीरान या इस दिल को वीराना कहें। -मजरूह सुल्तानपुरी
It is not just man who eats the roti, O oblivious one; often, it is the roti that devours the man. — Poetry and selected verses by the progressive Hindi-Urdu film lyricist Majrooh Sultanpuri
समाचार पत्र / पत्रिका प्रकाशन, समाचार पोर्टल, फेसबुक पेज, यूट्यूब चैनल, कंटेंट राइटिंग इत्यादि कार्यों, रिपोर्टर बनने के लिए संदेश के जरिये व्हाट्सऐप 9045290693 पर संपर्क करें। धन्यवाद ! -एपी भारती (पत्रकार, रुद्रपुर, उत्तराखंड)

