
वाराणसी। धर्म और आध्यात्मिकता में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। भक्ति को तो प्रेम का पर्यावाची माना गया है। लेकिन आदिकाल से धर्म के नाम पर हिंसा होती रही है। कई तरह की हिंसक, हत्यारी निजी सेनाआं की तरह अब एक बड़ी निजी सेना बनने जा रही है। उत्तराखंड के जोशीमठ स्थित ज्योतिर्मठ के प्रमुख शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने सोमवार को वाराणसी जिले में चतुरंगिणी सेना बनाने की घोषणा की। इसके लिए श्रीशंकराचार्य ने 27 सदस्यीय एक चतुरंगिणी सभा का गठन किया है। चतुरंगिनी सेना को आगे चलकर गोरक्षा के उद्देश्य से विस्तारित करने की योजना है। उन्होंने बताया कि यह पहल हिंदू समाज में व्याप्त भय को दूर करने और सत्य के साथ खड़े होने का साहस पैदा करने के उद्देश्य से की जा रही है। एक अक्षोहिणी चतुरंगिनी सेना में सैनिकों की संख्या 2 लाख 18 हजार के करीब होंगी, जिसमें महिलाओं की भी होंगी, जो अस्त्र -शस्त्र से सुसज्जित होंगी। सेना में प्रत्येक सनातनी की भागेदारी होगी। सेना के सैनिक फरसे,लाठी, तलवार और एयर बंदूकों से लैस होंगे, जो साधु-संतों के साथ-साथ सामान्य सनातनी हिन्दुओं के अधिकारों की रक्षा करेगी।
अविमुक्तेश्वरानंद ने बताया किया कि 2 लाख 18 हजार सैनिकों वाली चतुरंगिनी सेना को गौ रक्षा के उद्देश्य से विस्तारित करने की योजना है। उन्होंने दावा किया है कि 27 सदस्यों वाली चतुरंगिणी सभा अगले 10 महीनों के भीतर विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय रूप से कार्य करता हुआ नजर आएगा और लोगों के बीच विश्वास व सुरक्षा की भावना को मजबूत करेगा. शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि आज के समय में हिंदू समाज में कई लोग भय के कारण सच का साथ नहीं दे पाते और मजबूरी में गलत का समर्थन करने लगते हैं। ऐसे में चतुरंगिनी सेना का मुख्य उद्देश्य निर्बलों का बल बनना और समाज में न्याय स्थापित करना होगा। संगठन के कार्य करने के तरीके को टोको, रोको और ठोको के सिद्धांत से स्पष्ट किया।
अविमुक्तेश्वरानंद ने चतुरंगिनी सेना के फरसा धारण करने के सवाल पर भगवान परशुराम का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने पहले वेदों का अध्ययन किया और तपस्या में जीवन बिताया। उनके आश्रम में गौ माता की सेवा होती थी, लेकिन जब सहस्रार्जुन नामक राजा ने उन पर आक्रमण कर गायों को कष्ट पहुंचाया, तब उन्होंने उनकी रक्षा के लिए फरसा धारण किया। शंकराचार्य ने चतुरंगिनी सेना के टोको, श्रोको और ठोकोश् सिद्धांत को समझाते हुए बताया कि, सबसे पहले गलत कार्यों को चिन्हित कर लोगों को समझाने का प्रयास किया जाएगा, अगर सुधार नहीं होता है तो उसका विरोध कर उसे रोकने की कोशिश की जाएगी और अंतिम चरण में ठोको यानी वैधानिक प्रक्रिया के तहत शिकायत दर्ज कराने, पंचायत करने और संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों का उपयोग किया जाएगा।
अविमुक्तेश्वरानंद ने कि कहा कि भारतीय परंपरा के अनुसार किसी भी धार्मिक स्थल पर उसी धर्म के अनुयायियों को प्रवेश की अनुमति होती है। इसे सदियों पुरानी व्यवस्था बताते हुए उन्होंने कहा कि इसका पालन समाज में धार्मिक अनुशासन और मर्यादा बनाए रखने के लिए आवश्यक है। सैनिकों के फरसा धारण करने पर कहा कि भगवान परशुराम की परंपरा और प्रतीक का प्रतिनिधित्व करता है, जो अन्याय के खिलाफ खड़े होने की प्रेरणा देता है।
मालूम हो कि भाजपा और आरएसएस भी हिंदुओं में भय का माहौल पैदा कर राजनीतिक, आर्थिक लाभ उठाती रही है। दुनिया में और भी जगहों पर किसी खास धर्म या समुदाय के ठेकेदार भी यही करते रहे हैं। वसुधैव कुटुंबकम की बात कहने वाले हिंदू धर्म के राजनीतिक और धार्मिक नेता अन्य धर्मानुयाइयों का डर दिखा कर उनका दोहन करते रहे हैं। यही कोशिश अब शायद अविमुक्तेश्वरानंद भी करने में लगे हैं। सवाल है कि क्या चतुरंगिणी सेना सरकार से टकराएगी या लोगों से ? ऐसे में संविधान या कानून का क्या क्या मतलब रह जाएगा ?

