
19 सितंबर 1921 को रेसीफ, पेर्नाम्बुको राज्य, ब्राजील में पाऊलो फ्रेरे का जन्म हुआ। पाऊलो फ्रेरे ब्राजील के प्रख्यात शिक्षाविद, आलोचक और दार्शनिक और ब्राजीलियन शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति लाने वाले व्यकित् बने। पाऊलो फ्रेरे को मुख्य रूप से पेडागोजी ऑफ द ऑप्रेस्ड के लिए जाना गया जिसमें वे पढ़ाने को मूल्यों के महत्वपूर्ण सांस्कृतिक हस्तांतरण के बजाय आजादी के एक राजनीतिक काम के तौर पर देखते हैं। क्रिटिकल पेडागोजी (आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र) के संस्थापकों में से एक #PauloFreire का प्रभाव साक्षरता आंदोलनों, मुक्ति धर्मशास्त्र (लिबरेशन थियोलॉजी), उत्तर-औपनिवेशिक शिक्षा, मार्क्सवाद और सामाजिक न्याय व सीखने के समकालीन सिद्धांतों तक विस्तृत है। उन्हें जॉन डेवी और मारिया मोंटेसरी जैसी हस्तियों के साथ-साथ बीसवीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण शिक्षा-सिद्धांतकारों में से एक माना जाता है।
पाऊलो फ्रेरे के कुछ विचारोत्तेजक उद्धरण यहां प्रस्तुत हैं।
जो नेता संवाद से काम नहीं करते, बल्कि अपने फैसले थोपने पर जोर देते हैं, वे लोगों को संगठित नहीं करते, बल्कि उनका शोषण करते हैं। वे न तो खुद को आजाद करते हैं और न ही दूसरों कोरू वे दमन करते हैं। जितना अधिक कोई व्यक्ति क्रांतिकारी होता है, वह उतनी ही गहराई से वास्तविकता में उतरता है ताकि उसे बेहतर ढंग से समझकर, वह उसे बदल सके। यह व्यक्ति सामना करने, सुनने, दुनिया को बिना किसी पूर्वाग्रह के देखने से नहीं डरता। यह व्यक्ति लोगों से मिलने या उनसे बातचीत करने से नहीं डरता। यह व्यक्ति खुद को इतिहास या सभी लोगों का मालिक या शोषित लोगों का मुक्तिदाता नहीं मानता, लेकिन वह इतिहास में उनके साथ मिलकर संघर्ष करने के लिए खुद को समर्पित करता है।
यदि ढांचा संवाद की अनुमति नहीं देता है, तो ढांचे को बदलना होगा। दमनकारी लोग समुदाय के सभी लोगों को आगे बढ़ाने के पक्ष में नहीं होते, बल्कि चुनिंदा नेताओं को।
अतीत को देखने का एकमात्र उद्देश्य यह समझना है कि वे क्या हैं और कौन हैं, ताकि वे भविष्य को बेहतर ढंग से बना सकें। कोई भी ऐसी स्थिति जिसमें कुछ लोग दूसरों को पूछताछ की प्रक्रिया में शामिल होने से रोकते हैं, वह हिंसा है लोगों को अपने फैसले लेने से रोकना उन्हें वस्तु बना देना है। पहचान की भावना के बिना, कोई वास्तविक संघर्ष नहीं हो सकता। कोई भी पूरी तरह से बनकर पैदा नहीं होता, दुनिया में अपने अनुभव से ही हम वह बनते हैं जो हम हैं। शिक्षक निश्चित रूप से एक कलाकार होता है, लेकिन कलाकार होने का मतलब यह नहीं है कि वह छात्रों का व्यक्तित्व बना सकता है, उन्हें आकार दे सकता है।
शिक्षा में शिक्षक का काम छात्रों को खुद बनने में सक्षम बनाना है। सच्ची उदारता का मतलब है झूठी करुणा को बढ़ावा देने वाले कारणों को खत्म करने के लिए संघर्ष करना। झूठी करुणा भयभीत और दबे-कुचले लोगों, जीवन के उपेक्षित लोगों को अपने कांपते हाथों को आगे बढ़ाने के लिए मजबूर करती है। असली उदारता इस बात में है कि हम यह सुनिश्चित करें कि ये हाथ चाहे वे किसी व्यक्ति के हों या पूरे समाज के कम से कम भीख मांगने के लिए ही उठें, बल्कि वे ऐसे इंसानियत वाले हाथ बनें जो काम करें और काम करके दुनिया को बदलें।
ऐसे शिक्षा या राजनीतिक कार्यक्रम से सकारात्मक परिणाम की उम्मीद नहीं की जा सकती जो लोगों की अपनी सोच का सम्मान न करे। अच्छे इरादों के बावजूद ऐसा कार्यक्रम सांस्कृतिक आक्रमण है।
भाषा कभी तटस्थ नहीं होती।
क्योंकि पूछताछ के बिना, अभ्यास के बिना, व्यक्ति सच्चे अर्थ में इंसान नहीं बन सकता। ज्ञान केवल खोज और पुनः खोज से ही आता है, दुनिया में, दुनिया के साथ और एक-दूसरे के साथ मनुष्य जो लगातार, अधीर, आशापूर्ण पूछताछ करते हैं, उससे।
दबे-कुचले लोग, दमनकर्ता की छवि को अपने अंदर उतारकर और उसके नियमों को अपनाकर, आजादी से डरते हैं।
पढ़ना शब्दों पर चलना नहीं है बल्कि उनका सार समझना है।
शिक्षक का कर्तव्य है कि वह तटस्थ न रहे।
दबे-कुचले लोगों का सबसे बड़ा मानवतावादी और ऐतिहासिक कार्य खुद को आजाद करना है।
दमनकर्ता अपनी अधिक संपत्ति को एक विशेषाधिकार नहीं समझते जो दूसरों और खुद को भी इंसानियत से दूर करता है। वे यह नहीं समझते कि संपत्ति रखने वाले वर्ग के रूप में स्वार्थी होने से वे अपनी ही संपत्ति में दम घोंटते हैं और अब वे नहीं रहते वे केवल रखते हैं।
आजाद करने वाली शिक्षा ज्ञान की प्रक्रिया है, जानकारी का आदान-प्रदान नहीं।
क्योंकि प्रेम साहस का कार्य है, डर का नहीं, इसलिए प्रेम दूसरों के प्रति प्रतिबद्धता है। चाहे दबे-कुचले लोग कहीं भी हों, प्रेम का कार्य उनके मकसद आजादी के मकसद के प्रति प्रतिबद्धता है।
यह जरूरी है कि शक्तिहीन लोगों की कमजोरी को न्याय स्थापित करने की शक्ति में बदला जाए। ऐसा होने के लिए, भाग्यवाद का पूरी तरह से विरोध करना जरूरी है। हम बदलने वाले प्राणी हैं, ढलने वाले नहीं।
लोकतंत्र की महिमा करना और लोगों को चुप कराना एक नाटक है, मानवतावाद पर चर्चा करना और लोगों को नकारना झूठ है।
मानवताहीनता, भले ही यह इतिहास का एक ठोस तथ्य हो, लेकिन यह कोई नियति नहीं है बल्कि एक अन्यायपूर्ण व्यवस्था का परिणाम है जो दमनकर्ताओं में हिंसा पैदा करती है, जो बदले में दबे-कुचले लोगों को मानवताहीन बनाती है।
बस लोगों के बारे में सोचना, जैसा कि सत्ताधारी करते हैं, बिना किसी आत्म-समर्पण के, लोगों के साथ सोचना, यह निश्चित रूप से क्रांतिकारी नेता बनने से रोक देगा।
भीड़ हमेशा गलत होती है।
शिक्षा का महत्व इसलिए है क्योंकि महिलाएँ और पुरुष यह सीखते हैं कि सीखने के जरिए वे खुद को बना और बदल सकते हैं, क्योंकि वे ऐसे इंसान के तौर पर अपनी जिम्मेदारी खुद उठा सकते हैं जो जान सकता है यानी यह जान सकता है कि वह क्या जानता है और क्या नहीं।
यह कहना कि पुरुष और महिलाएँ भी इंसान हैं और इंसान होने के नाते उन्हें आजादी होनी चाहिए, और फिर भी इस बात को हकीकत में बदलने के लिए कुछ ठोस न करना, यह एक व्यंग्य है। -पाऊलो फ्रेरे
It is the duty of the teacher not to remain neutral—an inspiring, thought-provoking, and exemplary quote by the Brazilian educator, critic, and philosopher Paulo Freire
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