24 अक्टूबर 1921 को मैसूर (मैसूर राज्य, ब्रिटिश भारत, वर्तमान मैसूर, कर्नाटक) में आर. के. लक्ष्मण (रासीपुरम कृष्णस्वामी लक्ष्मण) का जन्म हुआ। आर. के. लक्ष्मण सुप्रसिद्ध भारतीय अंग्रेजी कार्टूनिस्ट, चित्रकार और व्यंग्यकार बने। आर. के. लक्ष्मण ने अपने करियर की शुरुआत पार्ट-टाइम कार्टूनिस्ट के रूप में की जिसमें वे मुख्य रूप से स्थानीय समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए काम करते थे। कॉलेज के दिनों में उन्होंने अंग्रेजी अखबार द हिंदू में अपने बड़े भाई आर. के. नारायण की कहानियों के लिए चित्र बनाए थे। उनकी पहली फुल-टाइम नौकरी लगी बंबई के द फ्री प्रेस जर्नल अंग्रेजी अखबार में, राजनीतिक कार्टूनिस्ट के रूप में। आगे चलकर आरके लक्ष्मण द टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार से जुड़ गए और अपने द कॉमन मैन (आम आदमी) किरदार के लिए मशहूर हुए, यह उनके जीवन का एक अहम मोड़ साबित हुआ। आर. के. लक्ष्मण के पिता एक हेडमास्टर थे और उनके आठ बच्चों (छह बेटे और दो बेटियाँ) में आरके लक्ष्मण सबसे छोटे थे। उनके बड़े भाई उपन्यासकार आर. के. नारायण थे। लक्ष्मण को दिल्ली का पाइड पाइपर (जादुई बांसुरी वादक) कहा जाता था, क्योंकि उनके रोज छपने वाले कार्टून लाखों पाठकों को मंत्रमुग्ध कर देते थे।
1954 में लक्ष्मण ने एशियन पेंट्स लिमिटेड के लिए गट्टू नाम का एक लोकप्रिय मैस्कॉट (शुभंकर) भी बनाया। उन्होंने कुछ उपन्यास भी लिखे, जिनमें पहला द होटल रिवेरा था। आर. के. लक्ष्मण के कार्टून मिस्टर एंड मिसेज 55 हिंदी फिल्म और कामराज तमिल फिल्म में दिखाई दिए। उनके कार्यों में मालगुडी डेज (जिसे उनके बड़े भाई आर. के. नारायण ने लिखा था और शंकर नाग ने निर्देशित किया था) के टीवी रूपांतरण के लिए बनाए गए स्केच, और कोंकण तट पर आधारित हिंदी सिटकॉम वागले की दुनिया भी शामिल हैं। लक्ष्मण ने डेविड लो, टी. एस. एलियट, डॉ. राजकुमार, बर्ट्रेंड रसेल, जे. बी. प्रीस्टली और ग्राहम ग्रीन जैसे लोगों के कैरिकेचर (व्यंग्यात्मक चित्र) भी बनाए थे। आर. के. लक्ष्मण ने अपने समय के दिग्गज राजनीतिज्ञों के कार्टून बनाए, नेता उनके कार्टूनों अक्सर असहज हो जाते थे। वहीं आम जन खुद को उनके कार्टूनों में पाता था।
कहते हैं कि पढ़ना सीखने से पहले ही आर. के. लक्ष्मण द स्ट्रैंड, पंच, बायस्टैंडर, वाइड वर्ल्ड और टिट-बिट्स जैसी लोकप्रिय पत्रिकाओं के चित्र देखकर बहुत प्रभावित होते थे। तीन साल की उम्र में, वे अपने घर के फर्श, दीवारों और दरवाजों पर खुद चित्र बनाने लगे और स्कूल में अपने शिक्षकों के कैरिकेचर (व्यंग्यात्मक चित्र) बनाने लगे। एक शिक्षक ने पीपल के पत्ते के उनके चित्र की तारीफ की, जिससे उन्हें लगा कि वे एक उभरते हुए कलाकार हैं। अपनी आत्मकथा द टनल ऑफ टाइम में लक्ष्मण लिखते हैं, मैं उन चीजों के चित्र बनाता था जो मेरे कमरे की खिड़की के बाहर मेरा ध्यान खींचती थीं, सूखी टहनियाँ, पत्तियाँ, छिपकली जैसे रेंगने वाले जीव, लकड़ी काटता हुआ नौकर और, बेशक, सामने की इमारतों की छतों पर अलग-अलग मुद्राओं में बैठे बहुत सारे कौवे।
9 साल की उम्र में लक्ष्मण ने कलाकार बनने का फैसला किया। वह मैसूर में साइकिल पर घूमते थे और अपने आस-पास की प्रकृति को देखते हुए कुछ ऐसा ढूंढते थे जिसे वे चित्रित कर सकें। आगे चलकर, उन्हें विदेशी पत्रिकाओं में चित्र (इलस्ट्रेशन) मिले जिनका उन्होंने अध्ययन किया। लक्ष्मण सर डेविड लो जैसे अन्य कलाकारों से भी प्रभावित हुए, लो दिग्गज ब्रिटिश कार्टूनिस्ट थे और अक्सर द हिंदू अखबार में दिखाई देते थे। आरके लक्ष्मण ने विंस्टन चर्चिल, एडोल्फ हिटलर और महात्मा गांधी जैसी अंतरराष्ट्रीय हस्तियों पर व्यंग्य करते हुए कार्टून बनाने शुरू किए। तब अखबारों में कार्टून का कालम भी महत्वपूर्ण होता था और अखबार वाले धारदार कार्टून बनाने वालों को बहुत तवज्जो देते थे।
आर. के. लक्ष्मण के दैनिक कार्टूनों में एक तरह का प्रदर्शनकारी पहलू भी होता है, जहाँ दर्शक लोकतंत्र की कमियों को वास्तविक समय में उभरते हुए देखते थे बजाय इसके कि वे किसी कार्रवाई के लिए उकसाए जाएँ। कुछ लोगों को कार्टून देखने का यह तरीका प्रभावी नहीं लगता। कार्टूनिस्ट रवि शंकर का मानना था कि इनमें कोई राजनीतिक टिप्पणी नहीं होती, बल्कि केवल राजनीतिक बयान होता है। लक्ष्मण ने खुद अपने काम में इस बेअसर होने की बात स्वीकार करते हुए कहा, मैं पच्चीस साल से भी ज्यादा समय से ये कार्टून बना रहा हूँ, और मुझे नहीं लगता कि मैं एक भी ऐसा उदाहरण दिखा सकता हूँ जहाँ मेरे कार्टूनों ने किसी नेता को कोई गलत कदम उठाने से रोका हो, अगर मैंने अपने काम में लगाई गई पूरी लगन के साथ, एक पंख से किसी पत्थर पर वार किया होता, तो शायद अब तक उस पत्थर पर पंख के कुछ निशान तो दिख ही जाते, लेकिन मेरे कार्टूनों ने इंसानी जिंदगी के किसी भी क्षेत्र, चाहे वह सामाजिक हो, आर्थिक हो या राजनीतिक, पर कोई असर नहीं डाला है।
यहां पेश हैं आर. के. लक्ष्मण के कुछ विचारणीय उद्धरण
मेरा आम आदमी हर जगह मौजूद है। वह इन 50 सालों से चुप है। वह बस सुनता रहता है।
आजकल की राजनीति बस यही है, बकवास, बकवास और बकवास। जिस दिन यह बंद हो जाएगी और हमारे नेताओं की गुणवत्ता बेहतर हो जाएगी, उस दिन मुझे रिटायर होकर जाना पड़ेगा।
मैं यह नहीं कहूँगा कि नेता देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। मुझे नहीं लगता कि वे ऐसा करते हैं। वे आम आदमी को भूल गए हैं उन्हें लगता है कि आम आदमी उन्हीं का है, और उसका काम उनकी सेवा करना है।
सच कहूँ तो, हमारी राजनीति इतनी निराशाजनक है कि अगर मैं कार्टूनिस्ट न होता, तो शायद मैंने आत्महत्या कर ली होती।
नए विचारों की तलाश एक कभी न खत्म होने वाली प्रक्रिया है।
मेरा स्केच पेन कोई तलवार नहीं है, बल्कि मेरा दोस्त है।
मैं यह नहीं भूला हूँ कि आप रंगीन काँच के टुकड़ों से भी दुनिया को देख सकते हैं।
हर सुबह मैं बड़बड़ाता हूँ, और दफ्तर जाते समय इस्तीफा देने की सोचता हूँ। लेकिन जब तक मैं घर वापस आता हूँ, मुझे अपना काम अच्छा लगने लगता है।
एक बच्चे के लिए, हकीकत कल्पना से कहीं ज्यादा अद्भुत होती है।
बचपन में मैं अपने कमरे की खिड़की के बाहर दिखने वाली चीजों के चित्र बनाता था, सूखी टहनियाँ, पत्तियाँ, छिपकली जैसे रेंगने वाले जीव, लकड़ी काटता हुआ नौकर, और सामने की इमारतों की छतों पर अलग-अलग मुद्राओं में बैठे बहुत सारे कौवे।
लेकिन मैं बचपन से ही कौवों को देखता आ रहा हूँ। मुझे इसके चेहरे का रंग बहुत पसंद आया। यह सात तक गिन सकता है, हाँ, सात तक। इनमें चीजों को बारीकी से देखने की क्षमता होती है। ये बहुत ही समझदार पक्षी होते हैं।
आलोचक यह तर्क दें कि लक्ष्मण के व्यंग्य में राजनीतिक सक्रियता की कमी है, लेकिन असल में यह शासन-व्यवस्था को लेकर एक गहरी समझ विकसित करता है। द कॉमन मैन (आम आदमी) खुद कोई दखल नहीं देता वह बस देखता है। उसका यह देखना, जो खुद उस पात्र और दर्शकों, दोनों के स्तर पर होता है, लक्ष्मण के काम का मुख्य सौंदर्यपरक और राजनीतिक पहलू बन जाता है। इससे यह बात पुष्ट होती है कि व्यंग्य केवल आलोचना का साधन ही नहीं, बल्कि घटनाओं का साक्षी बनने का एक जरिया भी है। लक्ष्मण की कहानी कहने की शैली उनके सिंगल-फ्रेम कार्टूनों को भारतीय लोकतंत्र के विकास पर एक चिंतन में बदल देती है। अपने लंबे और अत्यंत सक्रिय करियर के दौरान, उनके काम ने भारत की बदलती राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों को दर्ज किया है। उनके कार्टूनों में व्यंग्य के साथ-साथ लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की जटिलताओं पर टिप्पणी भी शामिल होती है। लक्ष्मण का काम इस बात को पुष्ट करता है कि लोकतंत्र एक निरंतर विकसित होने वाली व्यवस्था है, जिसे समय-समय पर फिर से परखने और उसका पुनर्मूल्यांकन करने की आवश्यकता होती है। -आर. के. लक्ष्मण
You can also view the world through shards of colored glass —Quotes, Thoughts, Observations and temperament of R. K. Laxman: cartoonist, illustrator, satirist, and chronicler of the ‘common man’ in a democracy
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