
25 अक्टूबर 1800, को लीसेस्टरशायर, यूनाइटेड किंगडम में थॉमस बैबिंगटन मैकाले का जन्म हुआ। थॉमस बैबिंगटन मैकाले ब्रिटिश इतिहासकार, कवि, शिक्षा प्रशासक और व्हिग राजनेता बने। मैकाले भारत में शिक्षा और न्याय की बेहतरी के लिए काम करने वाले प्रमुख व्यक्ति भी बने। थॉमस बैबिंगटन मैकाले ने 1839 से 1841 के बीच सेक्रेटरी एट वॉर (युद्ध सचिव) के पद पर और 1846 से 1848 के बीच पेमास्टर जनरल के पद पर कार्य किया। थॉमस बैबिंगटन मैकाले मुख्य रूप से अपनी पुस्तक द हिस्ट्री ऑफ इंग्लैंड के लिए जाने जाते हैं, जो व्हिग इतिहास का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। द हिस्ट्री ऑफ इंग्लैंड पुस्तक में मैकाले का यह विश्वास झलकता है कि सामाजिक-राजनीतिक प्रगति होना निश्चित है। किताब की लेखन शैली की काफी प्रशंसा की गई है। मैकाले सहित व्हिग इतिहासकारों ने 1642 से 1651 तक चले अंग्रेजी गृहयुद्ध में राउंडहेड्स (संसद समर्थकों) का समर्थन किया था। भारत की शिक्षा नीति तय करने में भी मैकाले की अहम भूमिका रही। युवावस्था में उन्होंने इवरी और द आर्माडा जैसी कविताएँ लिखीं। थॉमस बैबिंगटन मैकाले ने लेज ऑफ एंशिएंट रोम शीर्षक संग्रह में शामिल किया। यह रोमन इतिहास की वीरतापूर्ण घटनाओं पर आधारित कविताओं की बहुत लोकप्रिय श्रृंखला थी, जिसे उन्होंने भारत में लिखना शुरू किया, रोम में जारी रखा और 1842 में प्रकाशित किया। इनमें सबसे प्रसिद्ध कविता होरेटियस है, जो होरेटियस कोक्लेस की वीरता के बारे में है। इसमें अक्सर उद्धृत की जाने वाली ये पंक्तियाँ शामिल हैं तब बहादुर होरेटियस बोला,
जो द्वार का कप्तान था
इस धरती पर हर इंसान के लिए
मौत कभी न कभी तो आती ही है।
और इंसान इससे बेहतर तरीके से कैसे मर सकता है
कि वह बड़ी मुश्किलों का सामना करे,
अपने पूर्वजों की राख,
और अपने देवताओं के मंदिरों की रक्षा के लिए?
1840 के दशक में मैकाले ने अपना सबसे प्रसिद्ध लेखन द हिस्ट्री ऑफ इंग्लैंड फ्रॉम द एक्सेशन ऑफ जेम्स द सेकेंड (जेम्स द्वितीय के राज्यारोहण से इंग्लैंड का इतिहास) शुरू किया, जिसके पहले दो खंड 1848 में प्रकाशित हुए। शुरुआत में उन्होंने इस इतिहास को जॉर्ज तृतीय के शासनकाल तक ले जाने की योजना बनाई थी। अपने पहले दो खंडों के प्रकाशन के बाद उन्होंने 1714 में रानी ऐनी की मृत्यु तक अपना काम पूरा करने की उम्मीद की थी। तीसरे और चौथे खंड में इतिहास को पीस ऑफ रिजविक (रिजविक की संधि) तक लाए और यह 1855 में प्रकाशित हुए। 1859 में अपनी मृत्यु के समय मैकाले पांचवें खंड पर काम कर रहे थे। यह खंड विलियम तृतीय की मृत्यु तक के इतिहास को कवर करता है, उनकी मृत्यु के बाद उनकी बहन, लेडी ट्रेवेलियन द्वारा प्रकाशन के लिए तैयार किया गया था।
थॉमस बैबिंगटन मैकाले (लॉर्ड मैकाले) की भारत में नियुक्ति 10 जून 1834 को गवर्नर-जनरल की परिषद के प्रथम विधि सदस्य के पद पर हुई और जनरल कमेटी ऑफ पब्लिक इंस्ट्रक्शन (सार्वजनिक शिक्षा समिति) का अध्यक्ष भी नियुक्त किया गया था। 1834 से 1838 तक इस सर्वोच्च परिषद के सदस्य रहे। प्रस्ताव पर गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिंक ने 7 मार्च 1835 को अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम पारित किया जिससे अंग्रेजी को भारत में शिक्षा का आधिकारिक माध्यम और सरकारी भाषा स्वीकार किया गया। 1834 में #ThomasBabingtonMacaulay की अध्यक्षता में भारत के प्रथम विधि आयोग का गठन किया गया। मैकाले ने भारत के सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून व्यवस्था स्थापित करने के लिए भारतीय दंड संहिता का पहला प्रारूप (ड्राफ्ट) तैयार किया। यही ड्राफ्ट आगे चलकर 1860 में कानून के रूप में लागू हुआ और वर्तमान भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली का मुख्य आधार बना। मैकाले ने देश में न्याय प्रणाली को एकीकृत करने का प्रयास किया और यूरोपीय तथा भारतीय नागरिकों को कानून के समक्ष समान स्तर पर लाने का समर्थन किया। मैकाले ने भारत में प्रेस (समाचार पत्रों) पर लगी पाबंदियों को हटाने और अभिव्यक्ति की आजादी का भी पक्ष लिया।
यहां पेश हैं थॉमस बैबिंगटन मैकाले के कुछ चुनिंदा विचारणीय, पठनीय उद्धरण
मेरठ समिति ने मिस्टर हॉल्फोर्ड को निलंबित कर दिया क्योंकि उनके कारण दो यूरोपीय लड़कों को सजा मिली थी। मैं तो उन दोषी लड़कों को तुरंत निकाल देता। मुझे लगता है कि मिस्टर हॉल्फोर्ड का व्यवहार ऐसा नहीं है जिसे माफ न किया जा सके। अगर किसी शिक्षक को सुधारने का अधिकार दिया गया है तो यह उन मामलों में से एक है जहाँ उस अधिकार का इस्तेमाल करना उचित लगता है। अगर स्थानीय समिति को लगता है कि इस घटना की वजह से मेरठ में मिस्टर हॉल्फोर्ड की सेवाएँ कम उपयोगी हो जाएँगी तो मैं उनके लिए कोई दूसरी जगह ढूँढ़ दूँगा। लेकिन मुझे सच में नहीं लगता कि जो कुछ हुआ, वह उनके लिए नैतिक रूप से शर्मनाक है और न ही मुझे लगता है कि इसके आधार पर उन्हें एक नासमझ व्यक्ति माना जाना चाहिए।
सच तो यह है कि इसे लगभग एक सार्वभौमिक नियम माना जा सकता है कि अच्छे कवि अक्सर बुरे आलोचक होते हैं।
एक अमीर एल्डरमैन (नगर परिषद सदस्य) द्वारा सरकार के कुछ प्रमुख सदस्यों के लिए दिए गए रात्रिभोज में लॉर्ड ट्रेजरर और लॉर्ड चांसलर इतने नशे में थे कि उन्होंने अपने लगभग सारे कपड़े उतार दिए और पूरी तरह नग्न हो गए, और मुश्किलों के कारण वे महाराज के स्वास्थ्य की कामना करने के लिए किसी साइनपोस्ट पर नहीं चढ़ पाए।
फिर भी स्कॉटिश सैनिक न केवल बहुत तेजी से आगे बढ़े, बल्कि अपनी तोपों को भी अपने साथ ले जाने में सफल रहे। वे लिंकनशायर में दाखिल हुए और स्लीफोर्ड के पास ही थे, तभी उन्हें पता चला कि गिंकेल अपनी एक बेहद ताकतवर सेना के साथ उनके बिल्कुल पीछे आ रहा है।
एक ऐसा इतिहासकार, जिसका वर्णन करने की हम कोशिश कर रहे हैं, वास्तव में एक असाधारण बुद्धिमान व्यक्ति होगा। उसके दिमाग में ऐसी क्षमताएं जो शायद ही एक-दूसरे के साथ मेल खाती हों, एक बेहतरीन संतुलन के रूप में ढली होनी चाहिए।
हमें कभी भी किसी शिक्षा की गुणवत्ता को शिक्षक की गुणवत्ता से नहीं आंकना चाहिए या ऐसा नहीं होने देना चाहिए कि छोटी-मोटी कमियों की वजह से हमें कोई बड़ी अच्छाई न दिखे। ऐसा करना अन्यायपूर्ण होगा और इससे हम दुनिया की लगभग हर महान और अच्छी चीज से वंचित रह जाएंगे। मुझे आपको मैकाले की याद दिलाने दें। मेरी नजर में वह अब भी सबसे महान लेखकों और गुरुओं में से एक हैं, हालाँकि कुछ ऐसे कारणों से जो आप जानते हैं मैं उन्हें पूरी तरह से नीच, घृणित और तुच्छ मानता हूँ।
अपनी भाषाई क्षमताओं के बावजूद ऐसा लगता है कि उन्होंने कभी भी शास्त्रीय दुनिया या अपने समय के यूरोप के साथ मानसिक रूप से जुड़ने की कोशिश नहीं की। यह एक ऐसी संकीर्ण सोच थी जिसे भेदना असंभव था.और अगर उनका नजरिया संकीर्ण था भी तो वह निश्चित रूप से अंग्रेज होने के बजाय ब्रिटिश था।
किताबों से प्यार करना कितनी बड़ी नेमत है, जैसे कि मुझे उनसे प्यार हैय मरे हुए लोगों से बातचीत कर पाना और एक काल्पनिक दुनिया में जी पाना!
अगर कोई मुझे अब तक का सबसे महान राजा बना दे, जिसके पास महल, बगीचे, शानदार दावतें, शराब, गाड़ियाँ, बेहतरीन कपड़े और सैकड़ों नौकर हों, लेकिन शर्त यह रखे कि मुझे किताबें नहीं पढ़नी हैं तो मैं ऐसा राजा बनना कभी स्वीकार नहीं करूँगा। मैं एक ऐसे राजा के बजाय जिसे पढ़ना पसंद न हो एक गरीब इंसान बनकर किसी छोटी सी अटारी में रहना पसंद करूँगा जहाँ मेरे पास ढेर सारी किताबें हों।
किसी इंसान के असली चरित्र का पता तब चलता है कि जब उसे पता हो कि उसके किए का कभी किसी को पता नहीं चलेगा, तब वह क्या करता है।
किताबें मेरे लिए सब कुछ बनती जा रही हैं। अगर आज मुझे अपनी जिंदगी में कोई एक विकल्प चुनने को कहा जाए तो मैं खुद को किसी विशाल पुस्तकालय में डुबो दूँगा और जागते हुए अपना एक भी पल बिना किताब के नहीं बिताऊँगा।
हर दौर में लोग यह तो मानते हैं कि उनके समय तक लगातार सुधार होते आए हैं लेकिन अगली पीढ़ी में किसी सुधार की उम्मीद शायद ही कोई करता है। जो लोग कहते हैं कि समाज एक ऐसे मोड़ पर आ गया है जहाँ से अब सिर्फ गिरावट ही आएगी यानी हमने अपने सबसे अच्छे दिन देख लिए हैं हम पूरी तरह से यह साबित तो नहीं कर सकते कि वे गलत हैं। लेकिन हमसे पहले आने वाले सभी लोगों ने भी यही बात कही थी और उनके पास भी ऐसा कहने के लिए ठोस कारण थे। आखिर किस तर्क के आधार पर हम यह मान लें कि अब तक तो सिर्फ सुधार ही होते आए हैं, लेकिन आगे सिर्फ गिरावट ही देखने को मिलेगी?
प्यूरिटन लोग भालू को सताने वाले खेलों से नफरत करते थे ऐसा इसलिए नहीं कि इससे भालू को तकलीफ होती थी, बल्कि इसलिए कि इससे दर्शकों को मजा आता था।
सद्गुण का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि आपके पास असीमित शक्ति हो फिर भी आप उसका दुरुपयोग न करें।
कोई भी सामान्य कहावत या सिद्धांत उतना बेकार नहीं होता, जितना कि वह खुद होता है।
भाषण कला का उद्देश्य केवल सत्य बताना नहीं, बल्कि लोगों को अपनी बात मानने के लिए प्रेरित करना होता है।
एक महान लेखक अपने पाठकों का मित्र और हितैषी होता है।
पहली बात, एक समझदार इंसान यह जानता होगा कि किसी भी नियम को स्थापित करने के लिए सिर्फ एक प्रयोग काफी नहीं होता यहाँ तक कि उन विज्ञानों में भी नहीं, जो शासन-कला की तुलना में कहीं अधिक सरल हैं। दुनिया की शुरुआत से लेकर अब तक, कभी भी ऐसे दो राजनीतिक प्रयोग नहीं हुए हैं जिनकी सभी परिस्थितियाँ बिल्कुल एक जैसी रही हों। इतिहास से व्यावहारिक समझ सीखने का एकमात्र तरीका यही है कि बहुत सारे मामलों का गहराई से अध्ययन और तुलना की जाए। मैं किताबों से भरी एक झोपड़ी में गरीब रहना पसंद करूँगा, बजाय एक ऐसे राजा के होने के, जिसमें पढ़ने की कोई इच्छा ही न हो।
उन लोगों के एक बड़े वर्ग के मामले में जिनमें इतनी धर्म-भावना तो है कि गलत काम करने पर वे बेचैन हो उठें, लेकिन इतनी नहीं कि वे गलत काम करने से ही रुक जाएं उन्होंने एक बिल्कुल अलग तरीका अपनाया।
चर्च के प्रति उनका प्रेम, वास्तव में, किसी अध्ययन या चिंतन का परिणाम नहीं था। उनमें से शायद ही कोई ऐसा रहा होगा जो धर्मग्रंथों या चर्च के इतिहास का हवाला देकर यह बता सके कि वे चर्च के सिद्धांतों, रीति-रिवाजों और व्यवस्था को क्यों मानते हैं और न ही वे, एक समूह के रूप में उस नैतिक आचार-संहिता का सख्ती से पालन करते थे जो सभी ईसाई संप्रदायों में समान रूप से मान्य है। लेकिन सदियों का अनुभव यह साबित करता है कि लोग किसी ऐसे धर्म के लिए जान देने तक को तैयार हो सकते हैं, और दूसरों पर बेरहमी से अत्याचार भी कर सकते हैं जबकि वे न तो उस धर्म के मूल सिद्धांतों को समझते हैं और न ही उसके उपदेशों का पालन करते हैं बल्कि अक्सर उनका उल्लंघन ही करते हैं।
कॉपीराइट का सिद्धांत यह हैरू यह लेखकों को आर्थिक लाभ पहुँचाने के लिए पाठकों पर लगाया गया एक कर (टैक्स) है। यह एक बहुत ही बुरा कर है यह मानवीय आनंद के सबसे निर्दोष और कल्याणकारी रूपों में से एक पर लगाया गया कर है। और हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि निर्दोष आनंद पर कर लगाना, वास्तव में हानिकारक या अनैतिक आनंद को बढ़ावा देने जैसा है।
हम अतीत के इतिहास का जितना बारीकी से अध्ययन करेंगे, हमें उतना ही अधिक कारण मिलेगा कि हम उन लोगों की बातों से असहमत हों जो यह मानते हैं कि हमारे दौर में नई सामाजिक बुराइयाँ पैदा हुई हैं। सच तो यह है कि ये बुराइयाँ बिना किसी अपवाद के बहुत पुरानी हैं। जो नया है, वह है इन्हें पहचानने वाली समझदारी और इन्हें दूर करने का मानवीय प्रयास।
पिछले 160 वर्षों का हमारे देश का इतिहास, मुख्य रूप से भौतिक, नैतिक और बौद्धिक सुधारों का इतिहास है। जो लोग अपने वर्तमान समय की तुलना किसी ऐसे स्वर्ण युग से करते हैं जो केवल उनकी कल्पनाओं में मौजूद है वे शायद पतन और गिरावट की बातें कर सकते हैंय लेकिन जिसे अतीत की सही जानकारी है, वह वर्तमान को लेकर कभी भी निराश या उदास दृष्टिकोण नहीं रखेगा।
1688 की क्रांति के बारे में सबसे बड़ी तारीफ यही हो सकती है कि वह हमारी आखिरी क्रांति थी। किसी समझदार और देशभक्त अंग्रेज के मन में स्थापित सरकार के खिलाफ विरोध करने का विचार आए, ऐसा हुए अब कई पीढ़ियाँ बीत चुकी हैं। ईमानदार और विचारशील लोगों का यह पक्का मानना है और अनुभव के साथ यह विश्वास रोज मजबूत होता जाता है कि संविधान में किसी भी तरह के सुधार के लिए जरूरी उपाय संविधान के भीतर ही मिल सकते हैं। -थॉमस बैबिंगटन मैकाले
When is a person’s true character revealed? Thought-provoking quotes from Thomas Babington Macaulay—British historian, reformer of education and the judicial system in India, poet, and administrator
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