22 सितंबर 2024 को किलिंगवर्थ, कनेक्टिकट में अमेरिकी साहित्य समीक्षक, दार्शनिक और मार्क्सवादी राजनीतिक विचारक फ्रेडरिक जेमसन (फ्रेडरिक रफ जेमसन, जन्म 14 अप्रैल 1934 क्लीवलैंड, ओहियो) का निधन हो गया। फ्रेडरिक जेमसन समकालीन सांस्कृतिक रुझानों, खासकर उत्तर-आधुनिकता और पूंजीवाद के अपने विश्लेषण के लिए सबसे ज्यादा जाने गए। जेमसन की सबसे प्रसिद्ध किताबों में पोस्ट-मॉडर्निज्म, ऑर द कल्चरल लॉजिक ऑफ लेट कैपिटलिज्म और द पॉलिटिकल अनकॉन्शियस शामिल हैं। जेमसन ड्यूक यूनिवर्सिटी में तुलनात्मक साहित्य के नट श्मिट निल्सन प्रोफेसर, रोमांस स्टडीज (फ्रेंच) के प्रोफेसर और इंस्टीट्यूट फॉर क्रिटिकल थ्योरी के निदेशक रहे। 2012 में मॉडर्न लैंग्वेज एसोसिएशन ने जेमसन को लाइफटाइम स्कॉलरली अचीवमेंट (जीवन भर की विद्वतापूर्ण उपलब्धि) के लिए उन्हें अपना छठा पुरस्कार दिया।
उत्तर-आधुनिकता की अवधारणा और विश्लेषण में जेमसन का योगदान जोरदार रहा जिसका दायरा और प्रभाव सबसे व्यापक रहा। 2024 में उनकी मृत्यु के समय उन्हें उत्तर-आधुनिकता का सबसे प्रमुख समीक्षक माना गया। जेमसन का तर्क था कि उत्तर-आधुनिकता लेट कैपिटलिज्म (बाद के दौर के पूंजीवाद) की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है। उत्तर-आधुनिकता सामान के उत्पादन के बजाय तमाशे और स्टाइल की अर्थव्यवस्था में एक विशाल सांस्कृतिक विस्तार का रूप प्रस्तुत करती है। जेमसन ने विश्लेषण का यह तरीका उस समय विकसित किया जब कला-इतिहास से जुड़ी बहस में कई सालों से यह सवाल उठ रहा था कि क्या हमारा दौर आधुनिक कला से आगे बढ़कर उत्तर-आधुनिक कला की ओर बढ़ चुका है। #FredricJameson 1984 में पोस्ट-मॉडर्निज्म या लेट कैपिटलिज्म का सांस्कृतिक तर्क शीर्षक अपने लेख के साथ इस बहस में शामिल हुए, यह सबसे पहले न्यू लेफ्ट रिव्यू पत्रिका में छपा था। बाद में लेख को किताब के रूप में 1991 में प्रकाशित किया गया।
फ्रेडरिक जेमसन के कुछ विचारणीय उद्धरण यहां पेश हैं, अब यह आप पर है कि इन्हें आप कैसे समझते हैं।
पोस्ट-मॉडर्न (उत्तर-आधुनिक) के कॉन्सेप्ट को समझने का सबसे सही तरीका यह है कि इसे एक ऐसे दौर में वर्तमान को ऐतिहासिक नजरिए से देखने की कोशिश माना जाए, जो ऐतिहासिक रूप से सोचना ही भूल चुका है।
आज हमारे लिए लेट कैपिटलिज्म (बाद के दौर के पूँजीवाद) के टूटने की कल्पना करने के मुकाबले धरती और प्रकृति के पूरी तरह बर्बाद होने की कल्पना करना आसान लगता है शायद ऐसा हमारी कल्पना-शक्ति की किसी कमी की वजह से है।
इतिहास वह है जो तकलीफ देता है, जो हमारी इच्छाओं को नकारता है और व्यक्ति तथा समाज, दोनों के कामों (प्रैक्सिस) पर ऐसी सीमाएँ लगाता है जिन्हें बदला नहीं जा सकता।
उत्तर आधुनिकतावाद में, प्रकृति या पुराने, बहुत पुराने या प्राचीन अस्तित्व के कुछ हिस्से अभी भी बचे रहते हैं, संस्कृति उस प्रकृति के साथ कुछ कर सकती है और उस मूल आधार (रेफरेंट) को बदलने का काम कर सकती है। पोस्ट-मॉडर्निज्म तब आता है जब आधुनिकीकरण की प्रक्रिया पूरी हो जाती है और प्रकृति हमेशा के लिए खत्म हो जाती है।
लेकिन क्या होगा अगर कोई सामान्य भाषा, आम बोलचाल या भाषाई नियमों के अस्तित्व में ही यकीन न करे?
इसलिए, जहाँ एक थ्योरिस्ट (सिद्धांतकार) एक ऐसी मशीन बनाकर जीतता है जो ज्यादा से ज्यादा बंद और डरावनी होती जाती है, वहीं वह हारता भी है, क्योंकि ऐसा करने से उसके काम की आलोचनात्मक क्षमता बेकार हो जाती है, और उस मॉडल के सामने नकारने और विद्रोह करने की भावनाएँ, सामाजिक बदलाव की तो बात ही छोड़ दें, बेकार और मामूली लगने लगती हैं।
ऐसा लगता है कि जिजेक ने हिचकॉक को अपने सिस्टम से तो निकाल दिया है, भले ही उनके अवचेतन मन से नहीं, ऐसा कोई कभी नहीं कर पाता।
हम उत्पादन और काम की असलियतों से इतने दूर हो गए हैं कि हम बनावटी उत्तेजनाओं और टीवी पर दिखाए जाने वाले अनुभवों की सपनों की दुनिया में रहते हैं।
हम सब आदर्शवादी हैं, सब भौतिकवादी और आखिरी फैसला या लेबल बस विचारधारा या अगर आप चाहें तो राजनीतिक प्रतिबद्धता की बात है।
यह सोचना गलत है कि मार्क्सवाद बस व्याख्या का एक ऐसा तरीका है जो आर्थिक क्रम को ही सबसे अहम कोड मानता है, जिसमें बाकी क्रमों का अनुवाद किया जाना है। बल्कि मार्क्सवाद के लिए आर्थिक पहलू का उभरना, यानी खुद इंफ्रास्ट्रक्चर (बुनियादी ढाँचे) का सामने आना, असल में ठोस हकीकत के करीब आने का संकेत है। साहित्य या संस्कृति का पारंपरिक समाजशास्त्र, जो खुद को किसी टेक्स्ट में वर्ग-आधारित विषयों या मूल्यों की पहचान तक ही सीमित रखता है और यह मान लेता है कि उसका काम तब पूरा हो गया जब उसने यह दिखा दिया कि कोई रचना अपने सामाजिक परिवेश को कैसे दर्शाती है, बिल्कुल भी स्वीकार्य नहीं है।
टेक्स्ट को किसी ऐसी विकास-प्रक्रिया का हिस्सा नहीं माना जाता जहाँ उसे किसी पुराने रूप या शैली से निकला हुआ समझा जाए, न ही इसका संबंध किसी ऐसे आधार या संदर्भ से बाहरी तौर पर होता है जो शुरू में ही उससे अलग या परे मौजूद हो। बल्कि, रचना की सामग्री की जाँच उसके औपचारिक, तार्किक और खासकर उसके अर्थ-संबंधी (सिमेंटिक) आधारों के संदर्भ में की जाती है।
औपनिवेशिक इलाके और मुख्य साम्राज्य (मेट्रोपोलिस) के बीच ज्ञान-संबंधी अलगाव, और उस औपनिवेशिक श्रम को व्यवस्थित रूप से छिपाना जिस पर साम्राज्य की समृद्धि टिकी है, एक ऐसी स्थिति पैदा करता है जिसमें मुख्य साम्राज्य के अस्तित्व का सच खुद उसी साम्राज्य में दिखाई नहीं देता।
हम कह सकते हैं कि इस नजरिए से विचारधारा कोई ऐसी चीज नहीं है जो प्रतीकात्मक रचना को आकार देती है या उसमें शामिल होती है, बल्कि कलात्मक कार्य ही अपने आप में वैचारिक होता है, और कलात्मक या कथा-रूप की रचना को अपने आप में एक वैचारिक कार्य के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसका काम सामाजिक विरोधाभासों के लिए काल्पनिक या औपचारिक समाधान खोजना है, जिनका कोई सीधा हल नहीं होता।
शायद मानवीय अस्तित्व और सामूहिक इतिहास व उत्पादन की गतिशीलता के बीच के इस गहरे और बुनियादी अंतर को स्वीकार करना ही नए तरह के राजनीतिक नजरिएय नई राजनीतिक समझ और राजनीतिक धैर्य और साथ ही इस दौर को समझने और इसमें छिपे अकल्पनीय भविष्य की सूक्ष्म हलचलों को पढ़ने के नए तरीके पैदा कर सकता है।
यह सिनेकडोक (जहाँ छोटी सी झड़प पूरी लड़ाई का प्रतिनिधित्व करती है, जैसा कि बाल्जाक ने सुझाया था) सामूहिक प्रतिनिधित्व की असंभव समस्या पर वामपंथ की किसी भी कोशिश की तुलना में कहीं अधिक सीधा और जोरदार प्रहार है वामपंथ जो प्रदर्शनों और मार्च तक ही सिमट कर रह गया है, और जिसकी दुविधाओं को इस बात से साफ तौर पर समझा जा सकता है कि आइजेंस्टीन की फिल्म अक्टूबर की शूटिंग में बोल्शेविक क्रांति में असल में शामिल लोगों की तुलना में कहीं ज्यादा अभिनेताओं और एक्स्ट्रा कलाकारों ने हिस्सा लिया था।
पूंजीवाद एक ही समय में मानव जाति के लिए सबसे अच्छी और सबसे बुरी चीज है। धीरे-धीरे इसका मतलब यह होगा कि आप ऐसे भविष्य की कल्पना भी नहीं कर पाएंगे जो मौजूदा भविष्य से अलग हो और आखिरकार नकारात्मकता, कल्पना, फैंटेसी वगैरह के लिए कोई असली जगह नहीं बचेगी। इसलिए फ्रैंकफर्ट स्कूल की एक बड़ी चिंता यह थी, जैसे-जैसे युद्ध के बाद का दौर 1960 के दशक में आगे बढ़ा कि लेट कैपिटलिज्म (बाद के दौर का पूँजीवाद) वाला यह समाज उन सभी संभावित जगहों को खत्म कर रहा है जहाँ से इसका विरोध या इसे नकारा जा सकता था। -फ्रेडरिक जेमसन
Capitalism is at once the best and the worst thing for humanity—Thought-provoking quote by the American philosopher and Marxist political thinker Fredric Jameson
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