
4 अक्टूबर 1903 को प्रसिद्ध ऑस्ट्रियाई दार्शनिक ओटो वेनिंगर ने महज 23 साल की उम्र में वियना, ऑस्ट्रिया स्थित बीथोवन की मृत्यु वाले घर में (लुडविग वैन बीथोवेन, जर्मन संगीतकार, कंडक्टर और पियानोवादक, जिन्हें पश्चिमी संगीत के इतिहास के सबसे महान संगीतकारों में से एक माना जाता है) आत्महत्या कर ली। ओटो वेनिंगर की आत्महत्या के बाद उनकी लिखी किताब गेश्लेच्ट अंड कैरेक्टर (ैसैक्स एंड करेक्टर) नाम की किताब प्रकाशित हुई और काफी मशहूर हुई। ओटो वेनिंगर का लुडविग विट्गेन्स्टाइन और अगस्त स्ट्रिंडबर्ग पर गहरा असर पड़ा, ओटो वेनिंगर की कम जानी-पहचानी रचना उबर डाई लेज्टेन डिंगे के जरिए जेम्स जॉयस पर भी उनका प्रभाव पड़ा। सेक्स एंड कैरेक्टर में यह तर्क दिया गया है कि सभी लोग पुरुष और महिला तत्वों के मिश्रण से बने होते हैं, और इस विचार को वैज्ञानिक रूप से साबित करने की कोशिश की गई है। पुरुष पक्ष सक्रिय, उत्पादक, सचेत और नैतिक, तार्किक होता है, जबकि महिला पक्ष निष्क्रिय, अनुत्पादक, अचेत और अनैतिक, अतार्किक होता है। #OttoWeininger का तर्क है कि आजादी या मुक्ति केवल पुरुष-गुण वाली महिला (जैसे कुछ लेस्बियन) के लिए ही संभव है, और महिलाओं का जीवन यौन कार्यों में ही बीत जाता है, चाहे वह वेश्या के रूप में यौन क्रिया हो या माँ के रूप में संतानोत्पत्ति। महिला एक मैचमेकर (रिश्ते जोड़ने वाली) होती है। इसके विपरीत, पुरुष या व्यक्तित्व के पुरुष-गुण वाले पक्ष का कर्तव्य है कि वह जीनियस बनने की कोशिश करे और परम सत्य या ईश्वर के प्रति अमूर्त प्रेम के लिए कामुकता का त्याग कर दे, यह ईश्वर उसे अपने भीतर ही मिलता है।
ओटो वेनिंगर ने आत्महत्या के लिए बीथोवेन के घर को शायद इसलिए चुना कि वे बीथोवेन को सबसे महान जीनियस में से एक मानते थे। इस घटना ने उन्हें चर्चा का विषय बना दिया, कई लोगों को आत्महत्या के लिए प्रेरित किया और उनकी किताब में लोगों की दिलचस्पी बढ़ाई। इस किताब की स्वीडिश लेखक ऑगस्ट स्ट्रिंडबर्ग ने बहुत तारीफ की, उन्होंने लिखा कि इसने शायद सभी समस्याओं में सबसे मुश्किल समस्या यानी औरत की समस्या को हल कर दिया है। इस किताब ने रूसी दार्शनिक निकोलाई बेर्दयाएव को भी आकर्षित किया, जिन्होंने कहा कि नीत्शे के बाद इस समकालीन जर्मन, तेजी से बदलते कल्चर में कुछ भी इतना खास नहीं था।
ओटो वेनिंगर के कुछ विचारणीय उद्धरण यहां प्रस्तुत हैं
अपराधी (एक गुलाम के तौर पर) अक्सर किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश में रहता है जो बहुत उत्तम हो (और यहाँ, लोगों की कमियों को परखने वाले के तौर पर, अपराधी एक अच्छे इंसान से कहीं ज्यादा कठोर होता है), क्योंकि वह बाहर से भरोसा पाना चाहता है (न कि मन में अंदरूनी बदलाव के जरिए)। अगर उसे लगता है कि उसे ऐसा व्यक्ति मिल गया है, तो वह पूरी तरह से उसकी गुलामी स्वीकार कर लेता है, और जिद के साथ ऐसे लोगों को ढूँढ़ता है जिनकी वह गुलाम बनकर सेवा कर सके। वह गुलाम बनकर इसलिए भी जीना चाहता है ताकि कभी अकेला न रहे।
कम्युनिज्म (साम्यवाद) को सोशलिज्म (समाजवाद) से साफ तौर पर अलग समझा जाना चाहिए, कम्युनिज्म चीजों के सामूहिक स्वामित्व और निजी संपत्ति के अभाव पर आधारित है, जबकि सोशलिज्म का मतलब है, सबसे पहले व्यक्ति का व्यक्ति से और मजदूर का मजदूर से सहयोग और हर किसी में मानवीय व्यक्तित्व को मान्यता देना। सोशलिज्म आर्य विचारधारा है (ओवेन, कार्लाइल, रस्किन, फिक्टे)। कम्युनिज्म यहूदी विचारधारा है (मार्क्स)। आधुनिक सोशल डेमोक्रेसी शुरुआती सोशलिज्म से बहुत दूर हो गई है, ठीक इसलिए क्योंकि इसे विकसित करने में यहूदियों की बड़ी भूमिका रही है। इसमें मिल-जुलकर काम करने का तत्व होने के बावजूद, मार्क्सवादी सिद्धांत किसी भी तरह से राज्य को अलग-अलग व्यक्तियों के लक्ष्यों के मिलन के रूप में, या निचली इकाइयों के उद्देश्यों को जोड़ने वाली उच्च इकाई के रूप में नहीं देखता है।
अगर सच में ऐसा होता जैसा कि आम राय बनाने की कोशिश की गई है कि जीनियस (असाधारण प्रतिभा वाले लोग) आम लोगों से एक ऐसी मोटी दीवार से अलग होते जिसे कोई आवाज पार न कर सके, तो आम लोग जीनियस की कोशिशों को कभी समझ नहीं पाते और उनके कामों का उन पर कोई असर नहीं होता। तरक्की की सारी उम्मीदें इसी बात पर टिकी हैं कि यह बात सच नहीं है। और यह सच नहीं है। जीनियस लोगों और बाकियों के बीच का फर्क मात्रा का है, गुण का नहीं, डिग्री का फर्क है, प्रकार का नहीं।
ऐसा कैसे है कि औरत, जो खुद आत्मा-विहीन है, क्या वह इंसान की आत्मा को पहचान सकती है? जो खुद नैतिकता से परे है, वह किसी की नैतिकता के बारे में कैसे राय बना सकती है? जिसका अपना कोई चरित्र नहीं है, वह किसी के चरित्र को कैसे समझ सकती है? जिसकी अपनी कोई इच्छाशक्ति नहीं है, वह किसी की इच्छाशक्ति की सराहना कैसे कर सकती है?
हर जीनियस (प्रतिभाशाली व्यक्ति) अव्यवस्था और रहस्य पर जीत हासिल करता है।
जो पुरुष सच में महिलाओं के बारे में गहराई से सोचते हैं, वे उनके बारे में बहुत अच्छी राय नहीं रखते।
नेपोलियन, जो सबसे महान विजेताओं में से एक था, इस बात का पक्का सबूत है कि काम करने वाले महान लोग अपराधी होते हैं, और इसलिए, जीनियस नहीं होते। उसे समझने के लिए यह सोचना होगा कि उसने खुद से भागने की कितनी जबरदस्त कोशिश की थी। सभी विजेताओं में, चाहे वे बड़े हों या छोटे, यह बात होती है। चूँकि उसमें असाधारण प्रतिभा थी उससे पहले के किसी भी सम्राट से कहीं ज्यादा, इसलिए उसे अपने अंदर उठने वाली असहमति की आवाज को दबाने में ज्यादा मुश्किल हुई। उसकी महत्वाकांक्षा का मकसद अपने बेहतर व्यक्तित्व को दबाने की चाहत थी।
इंसान दुनिया की गहराई को केवल अपने अंदर से ही जान सकता है, दुनिया के आपसी संबंध उसी में निहित होते हैं।
सार्वभौमिकता जीनियस की पहचान है। कोई खास जीनियस नहीं होता, जैसे गणित का जीनियस, संगीत का जीनियस या शतरंज का जीनियस, बल्कि सिर्फ एक सार्वभौमिक जीनियस होता है। जीनियस वह व्यक्ति है जो बिना सीखे ही सब कुछ जानता है।
जो लोग तर्क और शुद्ध ज्ञान के अनुशासन को समझने की कोशिश करते हैं, उनमें हमेशा पागलपन का खतरा बना रहता है।
महान लोगों ने हमेशा वेश्या-प्रवृत्ति वाली महिलाओं को पसंद किया है।
इंसान दुनिया में अकेला है, एक जबरदस्त और कभी न खत्म होने वाले अकेलेपन में। उसका अपने बाहर कोई मकसद नहीं होता, वह किसी और चीज के लिए नहीं जीताय वह अपनी इच्छाओं, अपनी क्षमताओं और अपनी जरूरतों का गुलाम होने से बहुत दूर है, वह सामाजिक नैतिकता से कहीं ऊपर है, वह अकेला है। इस तरह वह एक और सब बन जाता है।
धातुओं और अधातुओं के बीच, रासायनिक संयोजनों और साधारण मिश्रणों के बीच जानवरों और पौधों के बीच फूल वाले पौधों (फैनरोगैम) और बिना फूल वाले पौधों (क्रिप्टोगैम) के बीच और स्तनधारियों और पक्षियों के बीच संक्रमणकालीन रूप होते हैं। अब यह मान लेना चाहिए कि प्रकृति में एक तरफ पुरुषत्व और दूसरी तरफ स्त्रीत्व के बीच कोई स्पष्ट विभाजन मिलना असंभव है या कोई भी जीव इस मामले में इतना सरल नहीं है कि उसे पूरी तरह से एक तरफ या दूसरी तरफ रखा जा सके।
प्रतिभा वंशानुगत होती है, यह पूरे परिवार की साझा संपत्ति हो सकती है (जैसे, बाख परिवार) जीनियस एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में नहीं जाता। यह कभी भी सबमें नहीं फैलता, बल्कि पूरी तरह से व्यक्तिगत होता है।
कुछ ऐसे पुरुष होते हैं जो किसी ऐसी महिला से शादी करने को तैयार हो जाते हैं जिसकी उन्हें कोई परवाह नहीं होती, सिर्फ इसलिए क्योंकि दूसरे पुरुष उसे पसंद करते हैं। बहुत से पुरुषों और उनके विचारों के बीच भी ऐसा ही रिश्ता होता है।
संक्षेप में महिला का जीवन अचेतन होता है, पुरुष का जीवन चेतन होता है, और जीनियस का जीवन सबसे अधिक चेतन होता है।
शिक्षा से पुरुष का असली स्वभाव कभी नहीं बदलता।
महान जीनियस अपने काम को अपने आस-पास की ठोस और सीमित परिस्थितियों से तय नहीं होने देता, जबकि राजनेता का काम इन्हीं परिस्थितियों से दिशा और अंत पाता है। असल में जीनियस ही इतिहास का निर्माता होता है, कोई और नहीं, क्योंकि केवल जीनियस ही इतिहास से बाहर और उससे प्रभावित हुए बिना रहता है।
यहूदी धर्म और ईसाई धर्म, व्यापार और संस्कृति, पुरुष और महिला, जाति और व्यक्ति, अयोग्यता और योग्यता, सांसारिक और उच्च जीवन, नकार और ईश्वर-तुल्य जीवन के बीच चुनाव करना होगा। मानवता को यह चुनाव करना है। केवल दो ही छोर हैं, और कोई बीच का रास्ता नहीं है।
किसी व्यक्ति का चित्रण करने के लिए उसे समझना जरूरी है, और उसे समझने के लिए उसके जैसा होना जरूरी है उसकी मनोवैज्ञानिक गतिविधियों को दिखाने के लिए उन्हें खुद में दोहराने में सक्षम होना जरूरी है। किसी व्यक्ति को समझने के लिए उसका स्वभाव खुद में होना चाहिए।
विज्ञान का महान व्यक्ति, जब तक वह दार्शनिक भी न हो, जीनियस कहलाने का उतना ही कम हकदार है जितना कि कर्मशील व्यक्ति।
कोई भी व्यक्ति उन लोगों के साथ और इसलिए उन लोगों के लिए, जिनके बीच वह रहता है, उतना दुखी नहीं होता जितना कि वह जीनियस होता है। क्योंकि एक तरह से, मनुष्य केवल दुख सहकर ही कुछ जान पाता है। अगर दया की भावना अपने आप में कोई स्पष्ट, अमूर्त या प्रतीकात्मक ज्ञान नहीं है, तो भी यह ज्ञान पाने की सबसे बड़ी प्रेरणा जरूर है। एक जीनियस इंसान को सिर्फ दुख सहकर ही समझ पाता है। और जीनियस सबसे ज्यादा दुख इसलिए सहता है क्योंकि वह हर किसी के साथ और हर किसी में दुख महसूस करता है लेकिन उसे सबसे ज्यादा दुख अपनी समझ की वजह से होता है।
खास जीनियस का सिद्धांत जिसके तहत माना जाता है कि संगीत का जीनियस दूसरे विषयों में मूर्ख होगा, जीनियस और हुनर (टैलेंट) के बीच भ्रम पैदा करता है। हुनर कई तरह के होते हैं, लेकिन जीनियस सिर्फ एक ही तरह का होता है, और वह किसी भी तरह के हुनर को चुनकर उसमें महारत हासिल कर सकता है। -ओटो वेनिंगर
Great men have always preferred women with the temperament of a prostitute—the view of Otto Weininger, the Austrian philosopher who committed suicide at the age of 23
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