14 जून 2022 को तेल अवीव सोरास्की मेडिकल सेंटर में इजराइली उपन्यासकार, निबंधकार और नाटककार ए. बी. येहोशुआ (अब्राहम गेब्रियल बूली येहोशुआ, जन्म 9 दिसंबर, 1936) का निधन हुआ। ए. बी. येहोशुआ को अमेरिकी अखबार न्यू यॉर्क टाइम्स ने इजराइली फॉल्कनर कहा। (यह तुलना विलियम कुथबर्ट फॉल्कनर से की गई है। विलियम फॉल्कनर अमेरिका के लोकप्रिय कथाकार थे)। येहोशुआ के काम में मुख्य विषय यहूदी पहचान, गैर-यहूदियों के साथ तनावपूर्ण संबंध, पुरानी और नई पीढ़ी के बीच टकराव और धर्म व राजनीति के बीच संघर्ष रहे हैं। इस्राइल की स्थापना चालबाजियों, दूसरे क्षेत्रों का अतिक्रमण, अरबों के साथ हिंसा के साथ हुई है इसलिए इस्राइल ने शुरु से अपने अड़ोसी-पड़ोसी देशों को सताया, निरंतर हिंसा, हत्या, अत्याचार, अतिक्रमण किया है। प्रत्युत्तर में फिलिस्तीनियों ने अपने बचाव के लिए हिंसा का प्रयोग किया है। निरंतर खून-खराबे, तनाव के बीच अनेक संवेदनशील लोग भी परेशान रहे हैं और राजनीतिक, धार्मिक नेतृत्व के अनैतिक कार्यों से असहमति जताई है, ए. बी. येहोशुआ के लेखन में यह झलकती है। इतालवी दैनिक अखबार ला स्टैम्पा के अनुसार, 2008-2009 के इजराइल-गाजा संघर्ष से पहले उन्होंने गाजा के निवासियों से हिंसा खत्म करने की अपील की थी। उन्होंने बताया कि इजराइली ऑपरेशन क्यों जरूरी था और इसे खत्म करना क्यों जरूरी था, इसलिए क्योंकि गाजा के लोग हमारे पड़ोसी हैं, हमें इस ऑपरेशन में संयम बरतना होगा। हमें जल्द से जल्द युद्धविराम तक पहुँचने की कोशिश करनी चाहिए। हम हमेशा पड़ोसी रहेंगे, इसलिए जितना कम खून बहेगा, भविष्य उतना ही बेहतर होगा। येहोशुआ ने आगे कहा कि उन्हें खुशी होगी अगर बॉर्डर क्रॉसिंग पूरी तरह से खोल दिए जाएं और फिलिस्तीनी सीजफायर (युद्धविराम) के तहत इजराइल में काम कर सकें।
यहां पेश हैं ए. बी. येहोशुआ के कृछ विचारणीय उद्धरण
यात्रा करना सीमाओं को पार करने की इच्छा का ही एक रूप है।
और यह हमारे जीवन के सबसे बड़े सवालों में से एक है, हम सीमाएं कैसे बनाए रखते हैं, हमें सीमाएं पार करने की क्या इजाजत है, और हम ऐसा कैसे करते हैं।
लिखने की प्रक्रिया का सबसे मुश्किल और पेचीदा हिस्सा शुरुआत करना है।
जायोनिज्म के सपनों में से एक सपना एक पुल बनने का था। इसके बजाय, हम पुल बनाने के बजाय पूरब और पश्चिम के बीच दूरियां पैदा कर रहे हैं, हम और ज्यादा पाने की अपनी बेवकूफी भरी इच्छा से पूरब और पश्चिम के बीच टकराव को बढ़ावा दे रहे हैं।
सच के मामले में भी ऐसा ही है, एक पल ऐसा आता है जब कोई कह सकता है, यही सच है और यहाँ मैं एक पूर्ण विराम लगाता हूँ, रुकता हूँ, और दूसरी चीज की ओर बढ़ता हूँ। एक जज को विचार-विमर्श खत्म करना पड़ता है। लेकिन एक इतिहासकार के लिए, अतीत का कभी अंत नहीं होता। यह चलता ही रहता है, चलता ही रहता है।
साहित्य के लिए करीबी रिश्ते खोजबीन करने, समझने और वर्णन करने के लिए एक खजाने की तरह हैं।
हम हमेशा से जानते थे कि शहीद सैनिकों का सम्मान कैसे करना है। वे हमारी खातिर मारे गए, वे हमारे मिशन पर गए थे। लेकिन हम किसी ऐसे आम आदमी का शोक कैसे मनाएं जो कैफे में बैठे हुए आतंकवादी हमले में मारा गया हो? आप उस गृहिणी का शोक कैसे मनाएंगे जो बस में चढ़ी और कभी वापस नहीं लौटी?
चूंकि विचारधारा इंसानी व्यक्तित्व का हिस्सा है, इसलिए इसे शाश्वत सत्यों की दुनिया में जगह मिलनी चाहिए।
मुझे नहीं लगता कि जब जायोनिज्म शुरू हुआ था, तो ऐसा कोई दावा किया गया था कि हम, आंशिक रूप से भी, दूसरे लोगों के लिए योगदान करने की अपनी क्षमता खो रहे हैं।
सीमाओं का सवाल यहूदी लोगों के लिए एक बड़ा सवाल है क्योंकि यहूदी लोग सीमाओं को पार करने के बड़े माहिर होते हैं। उनके भीतर अपनी पहचान का एक ऐसा अहसास होता है जो उन्हें दूसरे लोगों के साथ सीमाएं पार करने की इजाजत नहीं देता।
आत्मघाती बमबारी का हथियार इतना हताशा भरा होता है कि आपके पास बदला लेने या किसी को सजा देने की गुंजाइश भी नहीं बचती, आतंकवादी अपने शिकार लोगों के साथ ही मारा जाता है, उसका खून उनके खून के साथ मिल जाता है। -ए. बी. येहोशुआ #ABYehoshua
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