
23 मई 1891 को वैक्सजो, स्वीडन में पार लैगरक्विस्ट (पार फैबियन लैगरक्विस्ट) का जन्म हुआ। पार लैगरक्विस्ट विख्यात स्वीडिश लेखक बने जिन्हें 1951 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ। पार लैगरक्विस्ट ने अपनी 20 की उम्र के शुरुआती दौर से लेकर 70 की उम्र के आखिरी दौर तक कविताएँ, नाटक, उपन्यास, लघुकथाएँ और निबंध लिखे, जिन्हें जबरदस्त अभिव्यक्ति की शक्ति और प्रभावी रचनाएं माना गया। उनके लेखन का एक मुख्य विषय अच्छाई और बुराई का बुनियादी सवाल था, जिसकी पड़ताल उन्होंने बाराबास (वह व्यक्ति जिसे यीशु के बजाय आजाद किया गया था) और अहासुइरस (भटकता हुआ यहूदी) जैसे पात्रों के माध्यम से की। एक नैतिकवादी के तौर पर, उन्होंने ईसाई परंपरा के धार्मिक प्रतीकों और पात्रों का इस्तेमाल किया, लेकिन किसी चर्च के सिद्धांतों का पालन नहीं किया।
यह स्वीकार करना भी बहुत कड़वा अनुभव है कि हमारे दिल में प्यार का, दयालुता से बहुत कम लेना-देना होता है।
बचपन की दुनिया से ज्यादा अजनबी और कुछ नहीं होता, जब हम उसे सचमुच पीछे छोड़ चुके होते हैं।
अंतिम विस्मृति (पूरी तरह से भुला दिया जाना) से ज्यादा निश्चित और कुछ नहीं है।
इंसानों को खुद को धुंधले शीशों में देखना पसंद होता है।
अगर जिंदगी व्यर्थ न होती, तो कैसी होती? व्यर्थता ही वह नींव है, जिस पर यह टिकी हुई है। यह और किस नींव पर आधारित हो सकती थी, जो इसे थामे रखती और कभी ढहने न देती? एक महान विचार को दूसरा महान विचार कमजोर कर सकता है, और समय आने पर उसे पूरी तरह से मिटा भी सकता है। लेकिन व्यर्थता तक पहुँचना असंभव है, वह अविनाशी और अटल है। यह एक सच्ची नींव है, और इसीलिए इसे चुना गया है।
समस्त मानवीय संस्कृति, असल में, कुछ ऐसा पाने की कोशिश भर है जो हमारी पहुँच से बाहर है, कुछ ऐसा जो हमारी समझने की शक्ति से कहीं परे है। वह वहाँ खड़ी है, अधूरी, किसी धड़ की तरह दुखद। क्या मानवीय आत्मा खुद भी एक अधूरा धड़ नहीं है?
द्वेष को भी, प्यार की ही तरह, ज्यादा शब्दों की जरूरत नहीं होती।
प्यार एक ऐसी चीज है जो मर जाती है, और जब वह मर जाती है, तो सड़कर नई मोहब्बत के लिए मिट्टी बन जाती है। वह मृत प्यार, जीवित प्यार के भीतर अपना गुप्त जीवन जीता रहता है, और इस तरह, असल में, प्यार में कभी मृत्यु होती ही नहीं।
कितना ईर्ष्या-योग्य पागल है वह! जिस इंसान के लिए एक छोटा-सा कंकड़ भी कीमती हो, वह जहाँ भी जाए, खजानों से घिरा हुआ ही महसूस करेगा।
उन लोगों को समझना मुश्किल होता है जिनसे हम नफरत नहीं करते, क्योंकि ऐसे में हम निहत्थे होते हैं, हमारे पास ऐसा कुछ भी नहीं होता, जिससे हम उनकी असलियत या उनके अस्तित्व की गहराई तक पहुँच सकें। देखने में वह एक बहुत ही सभ्य और मिलनसार इंसान लगता था, लेकिन किसी इंसान को उसके चेहरे से नहीं आँका जा सकता। असल में, उनका शरीर ही यह दिखाता है कि वे किस तरह के जानवर हैं।
मैंने गौर किया है कि कभी-कभी मैं लोगों को डरा देता हूँय लेकिन असल में वे मुझसे नहीं, बल्कि खुद से डरते हैं। उन्हें लगता है कि मैं उन्हें डरा रहा हूँ, लेकिन असल में उन्हें डराने वाला तो उनके अंदर छिपा हुआ बौना है एक बंदर जैसे चेहरे वाला इंसान-नुमा जीव, जो उनकी आत्मा की गहराइयों से अपना सिर बाहर निकालता है। -पार लैगरक्विस्ट
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