
21 अप्रैल 1488 को स्टेकेलबर्ग कैसल, श्लुच्टर्न, जर्मनी में उलरिच वॉन हुटेन का जन्म हुआ। उलरिच वॉन हुटेन जर्मन नाइट, विद्वान, कवि और व्यंग्यकार थे, जो बाद में मार्टिन लूथर के अनुयायी और प्रोटेस्टेंट सुधारक बन गए। उलरिच वॉन हुटेन के लेखन से तत्कालीन व्यवस्था और सामाजिक स्थितियों का पता चलता है। 1509 में उलरिच वॉन हुटेन ग्रीफ्सवाल्ड विश्वविद्यालय में धर्मशास्त्र का अध्ययन कर रहे थे जहाँ शुरू में उनका स्वागत बड़े सौहार्दपूर्ण ढंग से किया गया। 1510 में उन्होंने विटेनबर्ग विश्वविद्यालय में धर्मशास्त्र का आगे का अध्ययन करने में समय बिताया। कहते हैं उलरिच वॉन हुटेन अपने बुर्जुआ संरक्षक कवि के नखरों, घमंड और अपनी उच्च सामाजिक स्थिति के बेतुके दावों को बर्दाश्त नहीं कर सके। इसी कारण हुटेन ने ग्रीफ्सवाल्ड छोड़ दिया, और जब वे वहाँ से निकले, तो उनके दोस्तों के नौकरों ने उनका एकमात्र सामान कपड़े और किताबें लूट लीं। कड़ाके की ठंड में, भूखे-प्यासे ठिठुरते हुए, खाली जेब बिल्कुल बेसहारा हालात में वे रोस्टॉक पहुँचे।
रोस्टॉक में, मानवतावादियों ने Ulrich von Hutten का खुशी-खुशी स्वागत किया, और उनके संरक्षण में उन्होंने अपने ग्रीफ्सवाल्ड के संरक्षकों के खिलाफ लिखना शुरू कर दियाय इस तरह उनके व्यंग्यों और व्यक्तिगत या सार्वजनिक शत्रुओं पर किए गए तीखे हमलों की एक लंबी श्रृंखला की शुरुआत हुई। रोस्टॉक में भी वे ज्यादा समय तक नहीं टिक सके, और भटकते हुए विटेनबर्ग पहुँचे, जहाँ 1511 में उन्होंने अपनी रचना प्रसिद्ध आर्स वर्सिफिकेटोरिया प्रकाशित की छंद आधारित रचना थी। उनका अगला पड़ाव लाइपजिग था, और फिर वहाँ से वे वियना पहुँचे, जहाँ उन्हें उम्मीद थी कि वे वेनिस के साथ हुए युद्ध पर एक विस्तृत राष्ट्रीय कविता लिखकर सम्राट मैक्सिमिलियन का कृपा-पात्र बन जाएँगे। लेकिन न तो मैक्सिमिलियन ने और न ही वियना विश्वविद्यालय ने उनकी मदद के लिए कोई हाथ बढ़ाया।
उलरिच वॉन हुटेन 1519 आते-आते रोमन कैथोलिक चर्च के एक मुखर आलोचक बन चुके थे। हुटेन ने पुनर्जागरण काल के मानवतावादियों और लूथरनवादी सुधार आंदोलन के बीच एक सेतु का काम किया। फ्रांज वॉन सिकिंगेन के साथ मिलकर वे पवित्र रोमन साम्राज्य के नाइट्स (शूरवीरों) के नेताओं में से एक बन गए। नाइट्स वॉर (शूरवीरों के युद्ध) में ये दोनों ही प्रमुख नेता थे।
बदलते हुए भाग्य के अनुसार अपनी आस्था बदल लेना विश्वासघात है। मेरे उद्देश्य की न्यायसंगतता ने मुझे विपरीत परिस्थितियों का भी डटकर सामना करने के लिए प्रेरित किया।
यदि आपको ऐसा प्रतीत होता है कि मैं अपनी स्थिति या अवस्था बदल रहा हूँ, तो भी मैं अपना मन या विचार नहीं बदलता। मैं सदैव हुटेन बने रहने का प्रयास करता हूँ, कभी भी स्वयं को नहीं छोड़ता, बल्कि जीवन के ऊबड़-खाबड़ और असमान रास्तों पर भी पूरे समभाव के साथ आगे बढ़ता रहता हूँ।
किसी भी प्रकार की दासता सभी मनुष्यों को अरुचिकर लगती है, परंतु विशेष रूप से उन लोगों के लिए दूसरों के अधीन रहना अत्यंत आपत्तिजनक है, जिन्हें शासन करना चाहिए।
एक नाइट (शूरवीर) की किस्मत ऐसी ही होती है कि भले ही मेरी पुश्तैनी दौलत मेरे गुजारे के लिए काफी और पर्याप्त हो, फिर भी यहाँ इतनी उथल-पुथल है कि मुझे जरा भी चैन नहीं मिलता। हम खेतों, जंगलों और किलों में रहते हैं। जिन लोगों की मेहनत से हमारा गुजारा चलता है, वे गरीब किसान हैं, हम अपने खेत, अंगूर के बाग, चारागाह और जंगल उन्हें ही किराए पर देते हैं। उनकी मेहनत के मुकाबले उन्हें मिलने वाला फायदा बहुत ही कम होता है। फिर भी, हम पूरी कोशिश करते हैं कि पैदावार खूब हो और भरपूर हो, क्योंकि हमें अपनी जमीनों का ध्यान बहुत ही लगन से रखना होता है। मुझे अपनी सुरक्षा की उम्मीद में किसी राजकुमार या सरदार से जुड़ना पड़ता है। वरना, हर कोई मुझे आसानी से लूटी जाने वाली चीज समझेगा। लेकिन अगर मैं किसी से जुड़ भी जाता हूँ, तो भी मेरी उम्मीदें खतरों और रोज की चिंताओं के बादलों में घिर जाती हैं। अगर मैं घर से बाहर निकलता हूँ, तो मुझे यह खतरा बना रहता है कि कहीं मैं ऐसे लोगों के हाथ न लग जाऊँ जो मेरे मालिक (ओवरलॉर्ड) के साथ लड़ाई या दुश्मनी रखते हों, चाहे मेरा मालिक कोई भी हो, और इसी वजह से वे मुझ पर हमला करके मुझे पकड़ ले जाएँ। अगर किस्मत खराब हो, तो मेरी आधी जमीनें फिरौती के तौर पर जब्त हो जाती हैं। जहाँ मैंने सुरक्षा की उम्मीद की थी, वहीं मैं फँस गया। हम अपनी जमीन की सीमा से दो योक (जमीन की एक माप) से ज्यादा दूर तक बिना हथियारों के नहीं जा सकते। इसी वजह से, हमें अपने साथ घोड़ों, हथियारों और सैनिकों का एक बड़ा जत्था रखना पड़ता है, और इन सब पर बहुत ज्यादा खर्च होता है। हम किसी पड़ोसी गाँव में घूमने, या शिकार करने, या मछली पकड़ने के लिए भी बिना लोहे के कवच (हथियारों) के बाहर नहीं जा सकते।
फिर, हमारे सैनिकों और दूसरे लोगों के बीच अक्सर झगड़े होते रहते हैं, शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता हो जब हमारे पास कोई न कोई झगड़ा सुलझाने के लिए न आता हो। हमें उन झगड़ों को जितनी समझदारी से हो सके, उतनी समझदारी से सुलझाना पड़ता है, क्योंकि अगर मैं अपने हक के लिए बहुत ज्यादा अड़ जाता हूँ, तो लड़ाई छिड़ जाती है, और अगर मैं बहुत ज्यादा नरम पड़ जाता हूँ, तो लोग तुरंत मुझे लूटने या मेरा फायदा उठाने लगते हैं। एक बार थोड़ी सी भी रियायत देने पर, लोग और भी ज्यादा माँगें करने लगते हैं। और यह सब किन लोगों के बीच होता है? अजनबियों के बीच नहीं, मेरे दोस्त, बल्कि पड़ोसियों, रिश्तेदारों और एक ही घर में रहने वाले लोगों, यहाँ तक कि सगे भाइयों के बीच भी।
यही हैं हमारे गाँव-देहात के सुख-चैन, हमारी शांति और सुकून। हमारा किला, चाहे वह मैदान में बना हो या पहाड़ पर, सुंदर नहीं, बल्कि मजबूत होना चाहिए, उसके चारों ओर खाई और ऊँची दीवारें होनी चाहिए, अंदर से वह तंग और सँकरा होना चाहिए, और उसमें मवेशियों के लिए बाड़े, तथा बंदूकों, तारकोल और बारूद के लिए गोदाम भरे होने चाहिए। फिर, वहाँ कुत्ते और उनका गोबर भी होता है, मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि उसकी महक भी बड़ी सुहावनी होती है। घुड़सवार आते-जाते रहते हैं, और उन्हीं के बीच लुटेरे, चोर और डाकू भी छिपे रहते हैं। हमारे दरवाजे लगभग हर आने-जाने वाले के लिए खुले रहते हैं, या तो इसलिए कि हमें पता नहीं होता कि वे कौन हैं, या फिर इसलिए कि हम उनके बारे में बहुत ज्यादा पूछताछ नहीं करते। यहाँ भेड़ों की में-में, मवेशियों की रंभाहट, कुत्तों का भौंकना, खेतों में काम करते लोगों का शोर, ठेलों और गाड़ियों की चरचराहट, हाँ, और यहाँ तक कि पास के जंगलों से भेड़ियों की हू-हू भी सुनाई देती है।
दिन आने वाले कल की चिंताओं, लगातार होने वाली रुकावटों और लगातार आने वाले तूफानों से भरा रहता है। खेतों की जुताई और गुड़ाई करनी होती है, बेलों की देखभाल करनी होती है, पेड़ लगाने होते हैं, और घास के मैदानों की सिंचाई करनी होती है। यहाँ खेत जोतने, बीज बोने, खाद डालने, फसल काटने, और गहाई करने का काम चलता रहता है, यानी फसल और अंगूर की कटाई का मौसम। अगर किसी साल फसल खराब हो जाए, तो उसके बाद घोर गरीबी, अशांति और उथल-पुथल का दौर शुरू हो जाता है। -उलरिच वॉन हुटेन
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