
11 अगस्त 2018 को लंदन, इंग्लैंड में नोबल साहित्य पुरस्कार प्राप्त उपन्यासकार वी. एस. नायपॉल (सर विद्याधर सूरजप्रसाद नायपॉल, जन्म 17 अगस्त 1932 चागुआनास, त्रिनिदाद और टोबैगो) का निधन हुआ। वी. एस. नायपॉल अंग्रेजी में अपने फिक्शन और नॉन-फिक्शन कामों के लिए मशहूर थे। वे त्रिनिदाद पर आधारित अपने शुरुआती मजेदार उपन्यासों, बाहरी दुनिया में अकेलेपन और अलगाव को दिखाने वाले गंभीर उपन्यासों, जीवन व यात्राओं के बारीक विवरणों के लिए जाने जाते हैं। उनकी गद्य शैली की बहुत तारीफ होती है किंतु उनके विचारों पर विवाद भी हुए। उन्होंने पचास सालों में तीस से ज्यादा किताबें लिखीं। #VSNaipaul का मशहूर उपन्यास अ हाउस फॉर मिस्टर बिस्वास 1961 में छपा था। नायपॉल को 1971 में उनके उपन्यास इन अ फ्री स्टेट के लिए बुकर पुरस्कार मिला। वी. एस. नायपॉल को 1983 में जेरूसलम पुरस्कार मिला और 1990 में त्रिनिदाद और टोबैगो के सबसे बड़ा राष्ट्रीय सम्मान ट्रिनिटी क्रॉस, 1990 में नाइटहुड और 2001 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। वी. एस. नायपॉल भारतीय मूल के थे, जिनके पूर्वज ब्रिटिश राज में मजदूरी कराने के लिए भारत से जबरन ले जाए गए थे।
यहां पेश हैं वी. एस. नायपॉल कुछ प्रेरक, विचारणीय उद्धरण
सिर्फ वे झूठ जिनके लिए हमें सच में सजा मिलती है, वे हैं जो हम खुद से बोलते हैं।
दुनिया जैसी है, वैसी ही है, जो लोग कुछ नहीं हैं, या जो खुद को कुछ नहीं बनने देते, उनके लिए इसमें कोई जगह नहीं है।
ज्यादातर लोग असल में आजाद नहीं होते। वे दुनिया में अपने लिए बनाई गई जगह तक ही सीमित रहते हैं। वे अपनी सोच के दायरे को छोटा करके अपनी संभावनाओं को भी सीमित कर लेते हैं।
नॉन-फिक्शन में बातों को घुमाया-फिराया जा सकता है तथ्यों को बदला जा सकता है। लेकिन फिक्शन कभी झूठ नहीं बोलता।
आखिरकार, हम अपनी संभावनाओं के बारे में जो सोच रखते हैं, उसी के हिसाब से खुद को बनाते हैं।
हर नई चीज पढ़ने के साथ उनकी अज्ञानता और बढ़ती हुई लगती थी।
दुनिया के बारे में आदर्शवादी नजरिया रखना गलत है। यहीं से गड़बड़ शुरू होती है। यहीं से सब कुछ बिखरने लगता है।
उनकी बहुत सारी राय थीं, लेकिन उन सबको मिलाकर भी कोई एक ठोस नजरिया नहीं बनता था। बहुत से अकेले रहने वाले लोगों की तरह, वे भी अपनी ही दुनिया में खोए रहते थे और बाहरी दुनिया में उन्हें ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी।
और मुझे अजीब लगा कि दुख बना रहता है और इंसान को मौत का इंतजार करने पर मजबूर कर सकता है, लेकिन जीत का एहसास बस एक पल के लिए होता है और फिर खत्म हो जाता है।
ऐसा नहीं है कि यहाँ सही और गलत का सवाल ही नहीं है। यहाँ कुछ भी सही नहीं है।
देखो लड़कों, क्या कभी तुम्हें ऐसा लगा है कि यह दुनिया असल में है ही नहीं? क्या कभी तुम्हें ऐसा लगा है कि दुनिया में सिर्फ हमारा ही दिमाग है और बाकी सब कुछ हम बस सोच रहे हैं? जैसे मैं यहाँ हूँ, दुनिया में सिर्फ मेरा ही दिमाग है, और मैं तुम लोगों के बारे में सोच रहा हूँ, जंग के बारे में सोच रहा हूँ, और उन सभी घरों, जहाजों और बंदरगाह पर खड़ी चीजों के बारे में सोच रहा हूँ। क्या कभी ऐसा ख्याल तुम्हारे मन में आया है?
जिंदगी बहुत अजीब चीज है। तुम मुसीबत को आते हुए देख सकते हो, लेकिन उसे रोकने के लिए कुछ भी नहीं कर सकते। तुम्हें बस बैठकर देखना और इंतजार करना होता है।
जो सरकार अपने ही कानून तोड़ती है, वह तुम्हें भी आसानी से तोड़ सकती है।
छोटी-छोटी चीजें हमें सोचने के नए तरीके सिखाती हैं।
कुछ भावनाएँ सालों के फासले को पाट देती हैं और ऐसी जगहों को जोड़ देती हैं जिनके बीच कोई संबंध नहीं होता।
घबराहट के समय कोई भी फैसला ले सकता है, लेकिन तेजी या कामयाबी के दौर में काम करने के लिए मजबूत इंसान की जरूरत होती है।
ताकतवर लोगों की छाया में कमजोर लोग एक-दूसरे पर जो ध्यान देते थे, वह कितना अजीब और बेतुका था!
कोई अजनबी मिगुएल स्ट्रीट से गुजरते हुए बस कुछ भी नहीं! कह सकता था क्योंकि उसे वहाँ कुछ खास नहीं दिखता था। लेकिन हम, जो वहाँ रहते थे, अपनी गली को एक पूरी दुनिया मानते थे, जहाँ हर कोई दूसरे से बिल्कुल अलग था। मैम-मैन पागल था, जॉर्ज बेवकूफ था, बिग फुट दादागिरी करता था, हैट एडवेंचर का शौकीन था, पोपो फिलॉसफर थाय और मॉर्गन हमारा कॉमेडियन था।
मैं उस तरह का लेखक हूँ जिसके बारे में लोग सोचते हैं कि दूसरे लोग उसकी किताबें पढ़ रहे हैं।
अगर किसी लेखक को पहले से ही पता हो कि क्या होने वाला है, तो उसकी किताब शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाती है।
उस समय, इसके बिना होना कितना भयानक होता, तुलसी परिवार के बीच मरना, उस बड़े, बिखरते हुए और बेपरवाह परिवार की गंदगी और बदहाली के बीचय शमा और बच्चों को उनके बीच, एक कमरे में छोड़ देना, या इससे भी बुरा, जमीन पर अपने हिस्से का दावा किए बिना ही जी लेना, जैसे पैदा हुए थे, वैसे ही बिना किसी जरूरत या सहारे के जीकर मर जाना।
ऐसे लोग, जिनके पास अपनी भावनाओं और जज्बातों को जाहिर करने के लिए शब्द नहीं थे, वे कैसे गुजारा करते होंगे? ज्यादा से ज्यादा, वे बस चुपचाप दुख सहते रहते थे। उनका दर्द और अपमान उनके स्वभाव में ही झलकते थे, जैसे कोई बुरी आत्मा किसी शरीर पर कब्जा कर ले, और शरीर को पता भी न चले कि उसने क्या किया है।
जहाँ कभी नॉर्दर्न रेंज की तलहटी में दलदल हुआ करता था, और मिट्टी की दीवारों वाली झोपड़ियाँ थीं जिन पर आधी ऊँचाई तक सीलन दिखती थी, वहाँ अब हॉलैंड जैसा नजारा था, गन्ने की खेती का महत्व खत्म हो चुका था। वहाँ का कोई भी भारतीय गाँव वैसा नहीं था जैसे गाँव मैंने देखे थे। न तंग रास्ते, न घने, झुके हुए पेड़, न झोपड़ियाँ, न गुड़हल की बाड़ वाले मिट्टी के आँगन, न त्योहारों पर दीये जलाना, न दीवारों पर परछाइयों का खेल, न आधी दीवार वाले बरामदों में खाना बनाना, न आग की लपटें, न नालियों या खंदकों के किनारे फूल जहाँ मेंढक रात भर टर्राते रहते थे। -वी. एस. नायपॉल
Thought-provoking quotes from Nobel Prize-winning novelist and writer V.S. Naipaul

