नई दिल्ली। अमेरिका ने भारत के साथ लगातार मुश्किलें खड़ी की हैं और भारत में नौकरी, कारोबार इत्यादि पर काफी प्रतिकूल असर डाला है। भारत सरकार भारत की अर्थव्यवस्था की बर्बादी को लेकर ट्रंप प्रशासन का विरोध नहीं कर रहा है। नतीजा ट्रंप प्रशासन की ज्यादतियां बढ़ती जा रही हैं। अमेरिका की यूनिवर्सिटीज में पढ़ाई करने का सपना देखने वाले भारतीय छात्रों के लिए वीजा की राह अब पहले की तरह आसान नहीं रह गई है। ट्रंप प्रशासन की सख्त इमिग्रेशन नीतियों और बढ़ती वीजा जांच के बीच भारतीय छात्रों को जारी होने वाले एफ-1 स्टूडेंट वीजा में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। खास बात यह है कि जहां भारत और चीन के छात्रों को कम वीजा मिले, पाकिस्तान, बांग्लादेश और वियतनाम के छात्रों के आंकड़ों में बढ़ोतरी देखने को मिली।
सेंटर फॉर इमिग्रेशन स्टडीज के आंकड़ों के मुताबिक, मई से अगस्त के बीच अमेरिका में यूनिवर्सिटी एडमिशन का पीक सीजन रहता है। इसी अवधि में 2025 के दौरान भारतीय छात्रों को जारी एफ-1 स्टूडेंट वीजा की संख्या पिछले साल की तुलना में 62 फीसदी कम रही। चीनी छात्रों पर भी अमेरिकी वीजा नीति का असर पड़ा। उन्हें पिछले साल के मुकाबले 34 फीसदी कम एफ-1 वीजा मिले। इसके विपरीत कुछ अन्य देशों के छात्रों के लिए तस्वीर अलग रही। 2025 की पहली छमाही में वियतनाम के छात्रों को 5,324 एफ-1 वीजा जारी किए गए, जो पिछले साल से 19.6 फीसदी अधिक हैं। बांग्लादेशी छात्रों को 2,098 वीजा मिले और इसमें 20.1 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। पाकिस्तान के छात्रों को 1,928 वीजा मिले, जो पिछले साल की तुलना में 44.3 फीसदी ज्यादा हैं।
सख्त इमिग्रेशन नीति का असर केवल छात्रों तक सीमित नहीं है। वॉशिंगटन पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2025 में अमेरिका में अप्रवासियों की संख्या करीब 5.33 करोड़ थी। जून तक यह घटकर लगभग 5.19 करोड़ रह गई। रिपोर्ट के मुताबिक, 1960 के दशक के बाद पहली बार अमेरिका में अप्रवासियों की आबादी में गिरावट दर्ज की गई है। इस मध्य अवैध अप्रवासियों के खिलाफ कार्रवाई तेज हुई है। आईसीई जैसी एजेंसियों को कार्रवाई के लिए अधिक अधिकार मिलने के बाद कई राज्यों में छापेमारी और गिरफ्तारियों की खबरें सामने आई हैं।
अमेरिका में बढ़ती वीजा सख्ती के बीच भारतीय छात्रों के लिए यूरोप एक आकर्षक विकल्प बनकर उभरा है। जर्मनी, फ्रांस, आयरलैंड, इटली और नीदरलैंड जैसे देश भारतीय छात्रों की पसंद में तेजी से शामिल हो रहे हैं। इसकी प्रमुख वजह अपेक्षाकृत कम फीस, वीजा प्रक्रिया और पढ़ाई के बाद रोजगार के अवसर बताए जा रहे हैं। यूरोप की कई यूनिवर्सिटीज की फीस अमेरिकी संस्थानों की तुलना में 50 से 80 फीसदी तक कम बताई जाती है। आंकड़ों के अनुसार, 2015 से 2023 के बीच यूरोप जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या 45 फीसदी बढ़ी। जर्मनी, फ्रांस, इटली और आयरलैंड में भारतीय छात्रों के दाखिलों में 68 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई।
अमेरिका में पढ़ाई के लिए जाने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में गिरावट आई है, लेकिन अमेरिकी कंपनियों में भारतीय प्रोफेशनल्स की मांग अभी भी मजबूत बनी हुई है। 2024 में जारी कुल एच-1बी वर्क वीजा में भारतीय नागरिकों की हिस्सेदारी करीब 71 फीसदी रही। यानी अमेरिका की सख्त इमिग्रेशन नीति ने भारतीय छात्रों के लिए रास्ता जरूर कठिन किया है, लेकिन अमेरिकी टेक्नोलॉजी और अन्य उद्योगों में भारतीय प्रोफेशनल्स की अहमियत अब भी बनी हुई है। आने वाले समय में वीजा नीतियों में बदलाव यह तय कर सकते हैं कि भारतीय छात्रों और प्रोफेशनल्स के लिए अमेरिका कितना आकर्षक विकल्प बना रहता है। अमेरिका जाने वाले छात्रों और अन्य अप्रवासियों के लिए वीजा प्रक्रिया पहले के मुकाबले ज्यादा सख्त हुई है। आवेदकों के दस्तावेजों, यात्रा इतिहास और अन्य जानकारियों की अधिक गहराई से जांच की जा रही है। इससे आवेदन प्रक्रिया लंबी होने के साथ मंजूरी में देरी भी हो रही है। स्टूडेंट वीजा इंटरव्यू दोबारा शुरू होने के बाद सोशल मीडिया गतिविधियों की जांच भी अमेरिकी वीजा प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी। आवेदकों से अपने सोशल मीडिया अकाउंट सार्वजनिक रखने को कहा गया, ताकि अधिकारी उनकी ऑनलाइन गतिविधियों की समीक्षा कर सकें। इसके अलावा, अमेरिका में शरण लेने के नियमों को भी कड़ा किया गया है। अवैध अप्रवासियों पर कार्रवाई बढ़ने से अमेरिका में रहने और काम करने वाले विदेशी नागरिकों के बीच भी अनिश्चितता बढ़ी है।
Studying in the US has become expensive and extremely difficult for Indian students; many are now turning to countries like Germany, France, Italy, and Ireland