17 अक्टूबर 1983 को पेरिस (फ्रांस) के चौथे अरोंदिसमों (प्रशासनिक जिले) में प्रमुख फ्रांसीसी दार्शनिक, समाजशास्त्री, राजनीति विज्ञानी, इतिहासकार, पत्रकार और 20वीं सदी के फ्रांस के सबसे प्रमुख विचारकों में से एक रेमंड आरोन (रेमंड क्लाउड फर्डिनेंड आरोनय जन्म 14 मार्च 1905 पेरिस, फ्रांस) का निधन हुआ। रेमंड आरोन को मुख्य रूप से उनकी 1955 की किताब द ओपियम ऑफ द इंटेलेक्चुअल्स (बुद्धिजीवियों की अफीम) के लिए जाना जाता है। इस किताब का शीर्षक कार्ल मार्क्स के उस दावे को पलटने का प्रयास है जिसमें उन्होंने धर्म को लोगों की अफीम कहा था। आरोन का तर्क था कि युद्ध के बाद के फ्रांस में मार्क्सवाद ही बुद्धिजीवियों की अफीम बन गया था। इस किताब में, #RaymondAron ने फ्रांसीसी बुद्धिजीवियों की आलोचना की। उन्होंने कहा कि ये बुद्धिजीवी पूंजीवाद और लोकतंत्र की तो कड़ी आलोचना करते थे, लेकिन साथ ही पूर्वी देशों की कम्युनिस्ट सरकारों के कार्यों का बचाव भी करते थे। आलोचक रोजर किम्बाल का मानना है कि द ओपियम ऑफ द इंटेलेक्चुअल्स बीसवीं सदी की एक अत्यंत महत्वपूर्ण किताब है। आरोन को दार्शनिक ज्यां-पॉल सार्त्र के साथ उनकी आजीवन दोस्ती के लिए भी जाना जाता है, यद्यपि उनके बीच अक्सर मतभेद भी रहे। फ्रांसीसी बुद्धिजीवियों के बीच एक कहावत काफी मशहूर हो गई थी, आरोन के साथ सही होने से बेहतर है कि सार्त्र के साथ गलत साबित हुआ जाए।
रेमंड आरोन ने कार्ल मार्क्स और कार्ल वॉन क्लॉजविट्ज पर भी किताबें लिखी हैं। अपनी किताब पीस एंड वॉर (शांति और युद्ध) में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय संबंधों का एक सिद्धांत प्रस्तुत किया। उनका तर्क था कि मैक्स वेबर का यह दावा कि किसी राज्य के पास ही शारीरिक बल के वैध प्रयोग का एकाधिकार होता है, विभिन्न राज्यों के आपसी संबंधों पर लागू नहीं होता। 1950 के दशक में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के क्षेत्र में आरोन ने यह परिकल्पना की थी कि परमाणु हथियारों के आ जाने के बावजूद, देशों को पारंपरिक सैन्य बलों की आवश्यकता बनी रहेगी। उन्होंने इसे परमाणु निषेध (न्यूक्लियर टैबू) का नाम दिया, जिसके कारण ऐसे सैन्य बलों की उपयोगिता और आवश्यकता बनी रहती है।
यहां पेश हैं रेमंड आरोन के कुछ विचारणीय उद्धरण
जो व्यक्ति अब किसी क्रांति या आर्थिक योजना से चमत्कारी बदलाव की उम्मीद नहीं रखता, उसे अन्यायपूर्ण स्थितियों के आगे हार मान लेने की कोई मजबूरी नहीं है। वह इसलिए ऐसा नहीं करता क्योंकि वह इंसानों को व्यक्तिगत रूप से पसंद करता है, समुदायों में हिस्सा लेता है और सच्चाई का सम्मान करता है इसीलिए वह अपनी आत्मा को मानवता के किसी अमूर्त आदर्श, किसी अत्याचारी राजनीतिक दल या किसी बेतुके सिद्धांतवाद के हवाले करने से इनकार कर देता है। अगर सहनशीलता संदेह से पैदा होती है, तो आइए हम सबको सिखाएं कि वे सभी मॉडलों और काल्पनिक आदर्शों (यूटोपिया) पर संदेह करें, और मुक्ति का दावा करने वाले पैगंबरों तथा तबाही की भविष्यवाणी करने वालों को चुनौती दें।
अगर संदेहवादी कट्टरता को खत्म कर सकते हैं, तो आइए हम उनके आने की कामना करें।
एक बुद्धिजीवी को कभी भी अपने विरोधी के तर्कों, भविष्य की अनिश्चितता, अपनी ही तरफ की कमियों, या हर जगह के आम इंसानों के बीच मौजूद आपसी भाईचारे को नहीं भूलना चाहिए।
संदेहवाद क्रांतिकारी नहीं हो सकता, भले ही वह क्रांति की ही भाषा क्यों न बोले।
आजादी संयमित माहौल में ही पनपती है यह पैगंबरों और भीड़ के उस जुनूनी विश्वास के सामने टिक नहीं पाती।
असल में फ्रांस का अस्तित्व खत्म हो चुका था। अब वह केवल फ्रांसीसी लोगों के एक-दूसरे के प्रति नफरत में ही बचा था।
यूरोपीय लोग अपने इतिहास से बचना चाहते हैं एक ऐसा महान इतिहास जो खून के अक्षरों में लिखा गया है। लेकिन करोड़ों अन्य लोग इसे पहली बार अपना रहे हैं, या फिर इसकी ओर वापस लौट रहे हैं।
क्या क्रांतियां इतने सम्मान के लायक हैं? जो लोग इनकी कल्पना करते हैं, वे इन्हें अंजाम नहीं देते। जो लोग इनकी शुरुआत करते हैं, वे शायद ही इनका अंत देख पाते हैं वे या तो निर्वासन में होते हैं या जेल में। अगर इस हिंसक और अराजक संघर्ष के नतीजे में जो हासिल होता है, उसमें कोई भी व्यक्ति अपने किए गए काम को नहीं पहचान पाता, तो क्या ऐसी क्रांतियां वास्तव में उस मानवता का प्रतीक हो सकती हैं जो अपनी नियति की खुद मालिक है?
संवैधानिक सरकार, शक्तियों का संतुलन, कानूनी गारंटी, और राजनीतिक सभ्यता का वह पूरा ढांचा जो सदियों में धीरे-धीरे खड़ा किया गया था और जो हमेशा अधूरा ही रहा उसे चुपचाप एक तरफ धकेल दिया जाता है। वे एक ऐसे निरंकुश राज्य को स्वीकार कर लेते हैं, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह क्रांति की सेवा कर रहा है उन्हें कई राजनीतिक दलों के होने या मजदूर वर्ग के संगठनों की स्वायत्तता में कोई दिलचस्पी नहीं होती। वे इस बात का विरोध नहीं करते कि वकील अपने मुवक्किलों को डराते-धमकाते हैं, या आरोपी लोग ऐसे अपराधों को कबूल कर लेते हैं जो कभी हुए ही नहीं। आखिर क्या क्रांतिकारी न्याय का लक्ष्य साथ रहने की समस्या का आमूल-चूल समाधान खोजना नहीं है, जबकि उदारवादी न्याय अन्यायपूर्ण कानूनों को लागू करता है?
जो व्यक्ति यह नहीं देख पाता कि इसमें सत्ता के लिए संघर्ष का तत्व भी शामिल है, वह नासमझ है और जो केवल इसी पहलू को देखता है, वह एक झूठा यथार्थवादी है।
मुसीबत झेलने का कोई पूर्व-प्रशिक्षण नहीं होता। जब यह हम पर आती है, तो हमें सब कुछ नया सीखना पड़ता है।
राज्यों और वर्गों के संघर्ष के दौरान होने वाले नरसंहार तब तक व्यर्थ नहीं माने जाएंगे, यदि वे एक ऐसे समाज का रास्ता साफ कर दें जहाँ कोई वर्ग न हो। इतिहास की पूजा करने की प्रवृत्ति एक ऐसी दबी हुई चाहत से पैदा होती है एक ऐसे भविष्य की चाहत जो हर अन्यायपूर्ण बात को भी सही ठहरा सके। इतिहास का उपासक यह मान लेता है कि वह एक ऐसे भविष्य को पाने के लिए काम कर रहा है जो वास्तव में सार्थक है। ऐसे में वह दूसरे व्यक्ति को केवल एक ऐसे दुश्मन के रूप में देखता है जिसे खत्म कर देना चाहिए एक ऐसा तुच्छ दुश्मन, जो न तो भलाई चाह सकता है और न ही उसे पहचान सकता है।
तथाकथित समाजवादी समाज भी, कुछ बदले हुए रूपों में, उन्हीं जरूरतों को फिर से अपना लेते हैं जो किसी भी आधुनिक आर्थिक प्रणाली का हिस्सा होती हैं। वहाँ भी, बिल्कुल पूंजीवाद की तरह, मालिक वर्ग ही नियम तय करता है। अब तक संसाधनों की कमी और आर्थिक शक्ति को जल्द से जल्द बढ़ाने की जल्दी के कारण, योजना बनाने वालों ने न तो अलग-अलग निवेशों की उत्पादकता पर ध्यान दिया है और न ही उपभोक्ताओं की पसंद पर। जल्द ही उन्हें मंदी, अपस्फीति के खतरों और आर्थिक हिसाब-किताब की कठोर वास्तविकताओं का सामना करना पड़ेगा।
वर्तमान के प्रति अत्यंत नैतिक दृष्टिकोण रखने वाला क्रांतिकारी, अपने कार्यों में बहुत ही निष्ठुर या संदेही हो सकता है। वह पुलिस की बर्बरता, औद्योगिक उत्पादन की अमानवीय गति, बुर्जुआ (पूंजीपति वर्ग की) अदालतों की कठोरता, और उन कैदियों को दी जाने वाली सजा जिनका अपराध पूरी तरह साबित नहीं हुआ है इन सबके खिलाफ आवाज उठाता है। न्याय की उसकी भूख तब तक शांत नहीं हो सकती, जब तक कि पूरी तरह से मानवीयकरण न हो जाए। लेकिन जैसे ही वह किसी ऐसे राजनीतिक दल से जुड़ने का फैसला करता है, जो स्थापित अव्यवस्था के प्रति उतना ही कट्टर दुश्मन है जितना कि वह खुद है, तो हम देखते हैं कि वह क्रांति के नाम पर उन सभी चीजों को माफ कर देता है, जिनकी उसने अब तक कड़ी आलोचना की थी। क्रांतिकारी मिथक, नैतिक कठोरता और आतंकवाद के बीच की खाई को पाटता है।
मैंने इस तथ्य से इनकार नहीं किया कि नेशनल असेंबली में दक्षिण और वाम के बीच अंतर था। मैंने जिस बात से इनकार किया, वह यह थी कि कोई शाश्वत वाम जैसी चीज होती है जो अलग-अलग ऐतिहासिक परिस्थितियों में एक जैसी रहे, समान मूल्यों से प्रेरित हो और एक जैसी आकांक्षाओं से जुड़ी हो।
तर्कवादी व्यक्ति मनुष्य के भीतर मौजूद पशुवत प्रवृत्तियों और समाज में मनुष्यों के आवेगों से अनजान नहीं होता। तर्कवादी ने बहुत पहले ही इस भ्रम को त्याग दिया है कि मनुष्य चाहे अकेले हों या समूहों में तर्कसंगत होते हैं। वह मानवता की शिक्षा पर दांव लगाता है, भले ही उसे यह पक्का यकीन न हो कि वह इस दांव में जीतेगा या नहीं। – रेमंड आरोन
Europeans wish to escape their own great history—a history written in letters of blood. — Reflections of Raymond Aron, a French philosopher, sociologist, political scientist, historian, and journalist
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