20 सितंबर 2005 को वियना, ऑस्ट्रिया में नात्सी पीड़ित, लेखक और ऑस्ट्रियाई होलोकॉस्ट सर्वाइवर (नाजी यातनाग्रह से जिंदा बचे) सिमोन वीजेंथल (जन्म 31 दिसंबर 1908 बुचाच, ऑस्ट्रिया-हंगरी) का निधन हुआ। सिमोन वीजेंथल आर्किटेक्चर की पढ़ाई की थी और दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत के समय ल्वीव में रह रहे थे। वे जानोव्स्का कंसंट्रेशन कैंप (1941 के आखिर से सितंबर 1944 तक), क्राको-प्लाजो कंसंट्रेशन कैंप (सितंबर से अक्टूबर 1944 तक), ग्रॉस-रोसेन कंसंट्रेशन कैंप, केमनिट्ज तक डेथ मार्च, बुचेनवाल्ड और माउथहौसेन कंसंट्रेशन कैंप (फरवरी से मई 1945 तक) से बचकर निकले थे।
1945 में जर्मनी की हार और दूसरे महायुद्ध के खत्म होने के बाद #SimonWiesenthal अपने पुराने आर्किटेक्ट के पेशे में नहीं लौटे, बल्कि उन्होंने अपना जीवन पलायन कर गए नाजी युद्ध अपराधियों का पता लगाने और उनके बारे में जानकारी इकट्ठा करने में लगा दिया, ताकि उन पर मुकदमा चलाया जा सके। 1947 में उन्होंने ऑस्ट्रिया के लिंज में ज्यूइश हिस्टोरिकल डॉक्यूमेंटेशन सेंटर की सह-स्थापना की, जहाँ सिमोन वीजेंथल और अन्य लोगों ने भविष्य में युद्ध अपराधों के मुकदमों के लिए जानकारी इकट्ठा की और यहूदी शरणार्थियों की उनके खोए हुए रिश्तेदारों को खोजने में मदद की। 1961 में उन्होंने वियना में यह काम फिर से शुरू किया, जहाँ उन्होंने एसोसिएशन ऑफ ज्यूइश विक्टिम्स ऑफ द नाजी रिजीम का डॉक्यूमेंटेशन सेंटर खोला और लापता नाजी युद्ध अपराधियों का पता लगाने की कोशिश जारी रखी। माना जाता है कि 1960 में ब्यूनस आयर्स में मोसाद द्वारा पकड़े गए एडॉल्फ आइचमैन का पता लगाने में शायद उनकी भी भूमिका रही हो। एडोल्फ आइकमैन, एडोल्फ हिटलर का खास अधिकारी, शुट्जस्टाफेल (एसएस) का अफसर, युद्ध अपराधों के दोषी और होलोकॉस्ट अर्थात नाजी जर्मनी में नरसंहार का मुख्य आयोजक था। सिमोन वीजेंथल फ्रांज स्टैंगल पर फाइल तैयार करने के लिए ऑस्ट्रियाई न्याय मंत्रालय के साथ मिलकर काम किया। स्टैंगल को 1971 में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। वीजेंथल ने निजी लोगों और इजराइल की मुख्य खुफिया एजेंसी मोसाद से मिले धन से पूरे समय रिसर्च का काम किया।
वॉल्टर्स और सेगेव दोनों ने वीजेंथल की कहानियों और उनकी असल उपलब्धियों के बीच अंतर बताया। सेगेव ने निष्कर्ष निकाला कि वीजेंथल ने अपनी कहानी सुनाने की आदत और सर्वाइवर गिल्ट (बच जाने का अपराधबोध) के कारण झूठ बोला था। डैनियल फिंकलस्टीन ने हंटिंग इविल में वाल्टर्स की रिसर्च को बेहतरीन बताया और बेन बारको का यह बयान कोट किया, यह मानना कि वीजेंथल दिखावा करने वाले, डींगें मारने वाले और हाँ, यहाँ तक कि झूठ बोलने वाले भी थे, उनके योगदान को स्वीकार करने के साथ-साथ चल सकता है। 1979 में वीजेंथल ने द वाशिंगटन पोस्ट से कहा, मैंने यहूदी नेताओं से कहा है कि वे होलोकॉस्ट में, मारे गए 60 लाख यहूदियों के बारे में बात न करें, बल्कि मारे गए 1.1 करोड़ नागरिकों के बारे में बात करें, जिनमें 60 लाख यहूदी भी शामिल हैं। 2017 के एक इंटरव्यू में येहुदा बाउर ने कहा कि उन्होंने वीजेंथल से यह आंकड़ा इस्तेमाल न करने के लिए कहा था। मैंने उनसे कहा, साइमन, आप झूठ बोल रहे हैं, वीजेंथल ने जवाब दिया, कभी-कभी आपको ऐसा करना पड़ता है ताकि उन चीजों के लिए नतीजे मिल सकें जिन्हें आप जरूरी समझते हैं। बाउर और दूसरे इतिहासकारों के अनुसार, वीजेंथल ने गैर-यहूदी पीड़ितों के लिए 50 लाख का आंकड़ा इसलिए चुना क्योंकि यह मारे गए 60 लाख यहूदियों की संख्या से थोड़ा कम था, लेकिन गैर-यहूदियों की सहानुभूति पाने के लिए काफी ज्यादा था। नाजी पीड़ितों की संख्या 1.1 करोड़ का आंकड़ा लोकप्रिय हो गया और राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने यूनाइटेड स्टेट्स होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूजियम बनाने के एग्जीक्यूटिव ऑर्डर में इसका जिक्र किया।
सिमोन वीजेंथल के कुछ विचारोत्तेजक उद्धरण यहां प्रस्तुत हैं
होलोकॉस्ट (नाजी नरसंहार) के समय भगवान शायद छुट्टी पर रहे होंगे।
भूलना तो समय के साथ अपने आप हो जाता है, लेकिन माफ करना अपनी मर्जी से किया जाने वाला काम है, और सिर्फ पीड़ित ही यह फैसला ले सकता है।
बुराई को पनपने के लिए बस अच्छे लोगों का कुछ न करना ही काफी है।
ऐसे लाखों परिवार थे जो बस अपने छोटे से घर में शांति और सुकून चाहते थे। इन्हीं लोगों के सहारे अपराधी सत्ता तक पहुँचे और उसे बनाए रखा।
उसके लिए हम मरे हुए के बराबर थे, हममें से हर कोई अपना डेथ सर्टिफिकेट साथ लिए घूम रहा था, बस उस पर तारीख लिखी होनी बाकी थी।
हँसी-मजाक निहत्थे लोगों का हथियार है, यह उन लोगों की मदद करता है जो दबे-कुचले हैं, ताकि वे उस स्थिति पर भी मुस्कुरा सकें जो उन्हें तकलीफ देती है।
दुनिया की सबसे अच्छी और असरदार जासूसी सेवा वेटिकन की है।
बिना न्याय के माफ करना खुद को तसल्ली देने वाली कमजोरी है। बिना प्यार के न्याय ताकत का दिखावा है।
क्या उसे पहले से पता था कि दफनाए जाते समय उसे सूरजमुखी का फूल मिलेगा? कातिल के पास मरने के बाद भी कुछ होगा, और मेरे पास?
हमेशा ऐसे लोग होंगे जिनकी सोच अलग होगी। मेरे देश में डेमोक्रेट और रिपब्लिकन हैं। यहाँ आप लोगों के बीच नाजी और एंटी-नाजी हैं। इसी वजह से दुनिया चलती रहती है।
मैं खड़ा हुआ और उसकी तरफ, उसके जुड़े हुए हाथों की ओर देखा। उनके बीच मानो एक सूरजमुखी का फूल रखा था।
आप पाएँगे कि इंसान के इतिहास में, जब से दुनिया बनी है, प्यार और न्याय एक-दूसरे के विरोधी रहे हैं। एक दौर में न्याय इंसानी आदर्श था, तो दूसरे में प्यार। प्यार में न्याय और न्याय में प्यार का ईश्वरीय विचार, इंसान ने बड़प्पन दिखाते हुए बनाने वाले (ईश्वर) पर छोड़ दिया है। आर्थर ने कहा, एक सुपरमैन ने एक सब-ह्यूमन (इंसान से कमतर माने जाने वाले व्यक्ति) से कुछ ऐसा करने को कहा जो सुपरह्यूमन (असाधारण) काम है। अगर तुमने उसे माफ कर दिया होता, तो तुम जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाते।
इसका मतलब होता यह जानना कि उसने शांति से मरने का कोई भी संदिग्ध अधिकार हमेशा के लिए खो दिया है। शायद तभी, और सिर्फ तभी, जब उसे यह एहसास हो कि उसे माफ नहीं किया जा सकता, तब शायद उसे माफी मिल सके और वह भी उन तीन तड़पती आत्माओं से, जो अब लाखों में बदल चुकी हैं।
ऐसी दुनिया में किसी बात पर यकीन करना नामुमकिन है जो इंसान को इंसान नहीं मानती और बार-बार यह साबित करती है कि कोई अब इंसान नहीं रहा। इसलिए जब किसी को शक होने लगता है, तो वह ऐसी दुनिया-व्यवस्था पर यकीन करना छोड़ देता है जिसमें भगवान की कोई अलग जगह हो। इंसान सच में सोचने लगता है कि भगवान छुट्टी पर हैं।
और मैं सोचता हूँ कि उसके जैसे लोग अब भी पैदा हो रहे हैं, ऐसे लोग जिनके मन में बुराई भरी जा सकती है। इंसानियत जाहिर तौर पर बड़ी तबाही को रोकने की कोशिश कर रही है मेडिकल तरक्की हमें उम्मीद देती है कि एक दिन बीमारियों पर जीत हासिल की जा सकेगी, लेकिन क्या हम कभी ऐसे लोगों को बनने से रोक पाएँगे जो बड़े पैमाने पर हत्याएँ करते हैं?
आजादी कोई ऐसी चीज नहीं है जो स्वर्ग से मिल जाती है, इसके लिए आपको हर दिन लड़ना पड़ता है।
अपने फायदे के लिए, हमारी त्रासदी से सीखें। यह कोई लिखा हुआ नियम नहीं है कि अगली बार शिकार सिर्फ यहूदी ही होंगे। शिकार कोई और भी हो सकता है।
नफरत और टेक्नोलॉजी का मेल इंसानियत के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
इंसान का इतिहास अपराधों का इतिहास रहा है, और इतिहास खुद को दोहरा सकता है। इसलिए जानकारी ही बचाव है। इसके जरिए हम इतिहास को दोहराए जाने से रोकने का इंतजाम कर सकते हैं, और हमें करना भी चाहिए।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हिटलर और स्टालिन आज भी जिंदा हैं वे हमारे भूलने का इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि इसी से इन दो राक्षसों का फिर से जन्म मुमकिन होता है।
जिंदा रहना एक विशेषाधिकार है जिसके साथ कुछ जिम्मेदारियाँ भी आती हैं। मैं हमेशा खुद से पूछता हूँ कि जो लोग जिंदा नहीं बच पाए, उनके लिए मैं क्या कर सकता हूँ।
नफरत कहीं भी पनप सकती है, आदर्शवाद कहीं भी क्रूरता में बदल सकता है। अगर नफरत और क्रूरता आधुनिक टेक्नोलॉजी के साथ मिल जाएँ, तो तबाही का मंजर कहीं भी फिर से शुरू हो सकता है।
मेरे लिए होलोकॉस्ट सिर्फ यहूदियों की त्रासदी नहीं थी, बल्कि इंसानी त्रासदी भी थी। युद्ध के बाद जब मैंने देखा कि यहूदी सिर्फ साठ लाख यहूदियों की त्रासदी के बारे में बात कर रहे थे, तो मैंने यहूदी संगठनों को पत्र लिखकर कहा कि वे उन लाखों दूसरे लोगों के बारे में भी बात करें जिन पर हमारे साथ ही जुल्म हुआ था, जिनमें से कई लोगों पर सिर्फ इसलिए जुल्म हुआ क्योंकि उन्होंने यहूदियों की मदद की थी।
इससे पहले कि मैं चीजों के बारे में ठीक से सोच पाता, मुझे एहसास हुआ कि हमें भूलना नहीं चाहिए। अगर हम सब भूल गए, तो वही चीज फिर से हो सकती है 20, 50 या 100 साल बाद।
मेरा मकसद न्याय था, बदला लेना नहीं। मेरा काम बेहतर कल और हमारे बच्चों और पोते-पोतियों के लिए ज्यादा सुरक्षित भविष्य बनाने के लिए है।
इंसानियत के विरुद्ध अपराधों के लिए न्याय की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए।
जब इतिहास पीछे मुड़कर देखे, तो मैं चाहता हूँ कि लोगों को पता चले कि नाजी लाखों लोगों को मारकर आसानी से बच नहीं पाए थे।
न्याय के बिना आजादी नहीं मिल सकती।
सहिष्णुता और मानवाधिकार एक-दूसरे के लिए जरूरी हैं।
दो हजार सालों के नरसंहार को क्या चीज जोड़ती है? बहुत कम हाथों में बहुत ज्यादा ताकत का होना। स्कूल अपनी चुप्पी की वजह से, चर्च अपनी माफी की वजह से, और घर माता-पिता की चुप्पी और सच को नकारने की वजह से नाकाम हो जाएंगे।
नई पीढ़ी को वह बात सुननी होगी जो पुरानी पीढ़ी बताने से इनकार करती है।
मैंने पोलैंड में अपनी माँ, अपने पिता और अपने 95 रिश्तेदारों को खो दिया है। मेरे लिए पोलैंड एक कब्रिस्तान है। -सिमोन वीजेंथल
What connects 2,000 years of genocide? A thought-provoking quote by Simon Wiesenthal—a victim of the Nazis, an author, and a Holocaust survivor
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