5 सितंबर 1906 को डुइनो, इटली में जाने माने ऑस्ट्रियाई गणितज्ञ और सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी लुडविग बोल्ट्जमैन (लुडविग एडवर्ड बोल्ट्जमैन, जन्म 20 फरवरी 1844 वियना, ऑस्ट्रिया) का निधन हुआ। लुडविग बोल्ट्जमैन की सबसे बड़ी उपलब्धियां सांख्यिकीय यांत्रिकी का विकास और ऊष्मागतिकी के दूसरे नियम की सांख्यिकीय व्याख्या थीं। सांख्यिकीय यांत्रिकी आधुनिक भौतिकी के स्तंभों में से एक है। यह बताती है कि कैसे मैक्रोस्कोपिक अवलोकन (जैसे तापमान और दबाव) माइक्रोस्कोपिक पैरामीटर से संबंधित होते हैं जो एक औसत के आसपास बदलते रहते हैं। यह ऊष्मागतिक मात्राओं (जैसे ऊष्मा क्षमता) को माइक्रोस्कोपिक व्यवहार से जोड़ती है, जबकि क्लासिकल ऊष्मागतिकी में एकमात्र विकल्प विभिन्न सामग्रियों के लिए ऐसी मात्राओं को मापना और उनकी तालिका बनाना होता था।
लुडविग बोल्ट्जमैन की गैसों की काइनेटिक थ्योरी (गतिज सिद्धांत) में परमाणु और अणुओं के अस्तित्व को पहले से ही सच मान लिया गया था लेकिन अर्न्स्ट माक और फिजिकल केमिस्ट विल्हेम ओस्टवाल्ड जैसे कई जर्मन दार्शनिकों और वैज्ञानिकों को उनके अस्तित्व पर यकीन नहीं था। बोल्ट्जमैन को जेम्स क्लर्क मैक्सवेल के पेपर इलस्ट्रेशन ऑफ द डायनामिकल थ्योरी ऑफ गैसेस से मॉलिक्यूलर थ्योरी (आणविक सिद्धांत) के बारे में पता चला, जिसमें तापमान को अणुओं की गति पर निर्भर बताया गया था। इससे बोल्ट्जमैन को एटॉमिज्म (परमाणुवाद) को अपनाने, फिजिक्स में स्टैटिस्टिक्स (सांख्यिकी) को शामिल करने और थ्योरी को आगे बढ़ाने की प्रेरणा मिली।
LudwigBoltzmann ने फिलॉसफी पर कई लेख लिखे, ऑन द क्वेश्चन ऑफ द ऑब्जेक्टिव एक्जिस्टेंस ऑफ प्रोसेसेस इन इनएनिमेट नेचर (1897)। लुडविग बोल्ट्जमैन यथार्थवादी थे, अपने काम ऑन थीसिस ऑफ शोपेनहावर में बोल्ट्जमैन अपनी फिलॉसफी को मैटेरियलिज्म (भौतिकवाद) बताते हैं और कहते हैं आइडियलिज्म (आदर्शवाद) का कहना है कि सिर्फ मैं, और अलग-अलग विचार ही मौजूद हैं और यह उन्हीं से मैटर (पदार्थ) को समझाने की कोशिश करता है। मैटेरियलिज्म मैटर के अस्तित्व से शुरू होता है और उसी से संवेदनाओं को समझाने की कोशिश करता है।
1885 में लुडविग बोल्ट्जमैन इंपीरियल ऑस्ट्रियन एकेडमी ऑफ साइंसेज के सदस्य बने और 1887 में ग्राज यूनिवर्सिटी के प्रेसिडेंट बने। उन्हें 1888 में रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज का सदस्य और 1899 में रॉयल सोसाइटी का विदेशी सदस्य चुना गया। लुडविग बोल्ट्जमैन को 1892 में मैनचेस्टर लिटरेरी एंड फिलॉसॉफिकल सोसाइटी की मानद सदस्यता दी गई। उनके सम्मान में कई चीजों का नाम रखा गया है।
यहां प्रस्तुत हैं लुडविग बोल्ट्जमैन के कुछ जटिल और विचारणीय उद्धरण
जो सच है उसे सामने लाओ, उसे स्पष्ट रूप से लिखो, और अपनी आखिरी सांस तक उसका बचाव करो!
एक अच्छे सिद्धांत से अधिक व्यावहारिक कुछ भी नहीं है।
अस्तित्व के संघर्ष और दुनिया के विकास में उपलब्ध ऊर्जा ही मुख्य दांव पर लगी चीज है।
जीवन का संघर्ष मुख्य रूप से उपलब्ध ऊर्जा के लिए एक प्रतियोगिता है।
ऊष्मागतिकी, यदि सही ढंग से समझी जाए, तो डार्विन के विकासवाद की अनुमति ही नहीं देती, बल्कि उसका समर्थन भी करती है।
जीवित प्राणियों का अस्तित्व के लिए सामान्य संघर्ष कच्चे माल (जीवों के लिए हवा, पानी और मिट्टी, जो सभी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं) के लिए नहीं है, और न ही ऊर्जा के लिए है (जो सूर्य और किसी भी गर्म पिंड में ऊष्मा के रूप में प्रचुर मात्रा में मौजूद है), बल्कि यह एंट्रॉपी के लिए संघर्ष है, जो गर्म सूर्य से ठंडी पृथ्वी तक ऊर्जा के स्थानांतरण के माध्यम से उपलब्ध होती है।
दर्शनशास्त्र मुझे परेशान करता है। यदि हम हर चीज के अंतिम आधार का विश्लेषण करें, तो अंततः सब कुछ शून्यता में बदल जाता है। लेकिन मैंने अपने व्याख्यान फिर से शुरू करने और संदेह के हाइड्रा (एक पौराणिक बहु-सिर वाला राक्षस) की आँखों में सीधे देखने का फैसला किया है, और अगर कोई अपने जीवन को महत्व देता है तो यह काफी खतरनाक हो सकता है।
बड़े राष्ट्रीय उपक्रमों में लाखों लोगों को आदेश देना, युद्ध में एक लाख लोगों को जीत की ओर ले जाना शानदार हो सकता है। लेकिन मुझे एक बहुत ही साधारण कमरे में बहुत ही साधारण साधनों के साथ मौलिक सच्चाइयों की खोज करना और भी महान लगता है, ऐसी सच्चाइयां जो मानव ज्ञान का आधार बनी रहेंगी, तब भी जब इन लड़ाइयों की यादें केवल इतिहासकारों के अभिलेखागार में ही बड़ी मुश्किल से सहेज कर रखी जाएंगी।
एक गणितज्ञ कुछ पन्ने पढ़ने के बाद ही कॉची, गॉस, जैकोबी या हेल्महोल्ट्ज को पहचान लेगा, ठीक वैसे ही जैसे संगीतकार शुरुआती कुछ धुनों से ही मोजार्ट, बीथोवेन या शुबर्ट को पहचान लेते हैं। अमेरिका के बारे में कौन सी बात ज्यादा हैरान करने वाली है, यह कि करोड़पति आदर्शवादी होते हैं या यह कि आदर्शवादी करोड़पति बन जाते हैं?
चूंकि कोई सिस्टम अपने आप किसी दूसरी उतनी ही संभावित अवस्था में नहीं जा सकता, बल्कि ज्यादा संभावित अवस्था में ही जाता है, इसलिए ऐसी चीजों का सिस्टम बनाना भी असंभव है जो अलग-अलग अवस्थाओं से गुजरने के बाद समय-समय पर अपनी मूल अवस्था में लौट आए, यानी एक परपेचुअल मोशन मशीन (हमेशा चलने वाली मशीन) बनाना।
दर्शनशास्त्र के लिए सबसे आम चीजें भी कभी-कभी ऐसी पहेलियाँ बन जाती हैं जिन्हें सुलझाना मुश्किल होता है। बड़ी चतुराई से यह जगह (स्पेस) या समय की अवधारणा बनाता है और फिर पाता है कि इस जगह में चीजों का होना या इस समय के दौरान प्रक्रियाओं का होना बिल्कुल असंभव है, इस तरह के तर्क का स्रोत सोच के तथाकथित नियमों में अत्यधिक विश्वास है।
मेरी नजर में, दर्शनशास्त्र का सारा उद्धार डार्विन के सिद्धांत से ही हो सकता है।
गैसों के गतिशील सिद्धांत पर मैक्सवेल के लेखों से कौन परिचित नहीं है? एक तरफ अवस्था के समीकरण आते हैं, दूसरी तरफ, केंद्रीय क्षेत्र में गति के समीकरण। फॉर्मूलों का घालमेल और बढ़ता जाता है।
सबसे गहरी बात समझने के लिए, मैंने हेगेल को पढ़ा, वहाँ मुझे शब्दों का कितना अस्पष्ट और बिना सोचे-समझे किया गया प्रवाह मिला! मेरी बदकिस्मती मुझे हेगेल से शोपेनहावर के पास ले गई, कांट की बातों में भी ऐसी कई चीजें थीं जिन्हें मैं बहुत कम समझ पाता था, उनकी तेज बुद्धि को देखते हुए मुझे लगभग शक होने लगा कि वे पाठक का मजाक उड़ा रहे हैं या कोई ढोंगी हैं। -लुडविग बोल्ट्जमैन
Memorable quote by the Austrian mathematician and theoretical physicist Ludwig Boltzmann
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