4 सितंबर 1997 को मुंबई में भारत के दिग्गज हिंदी कवि, लेखक, नाटककार और सामाजिक विचारक धर्मवीर भारती (जन्म 25 दिसंबर 1926, इलाहाबाद) का निधन हुआ। धर्मवीर भारती हिंदी साप्ताहिक पत्रिका धर्मयुग के मुख्य संपादक रहे। धर्मवीर भारती 1972 में भारत सरकार द्वारा साहित्य के क्षेत्र में पद्मश्री से सम्मानित किए गए। उनका उपन्यास गुनाहों का देवता एक क्लासिक रचना बन गया। भारती की रचना सूरज का सातवां घोड़ा पर आधारित इसी नाम की फिल्म 1992 में श्याम बेनेगल ने बनाई, जिसे राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। महाभारत की घटनाओं पर आधारित उनका नाटक अंधा युग बहुत लोकप्रिय हुआ और हर साल देश में अनेक बार अलग-अलग क्षेत्रों में नाट्य संस्थाओं, नाटक मंडलियों द्वारा अंधा युग को सार्वजनिक रूप से मंचित किया जाता है। अंधा युग में क्रूरता और विनाश को बारीकी से चित्रित किया गया है।
धर्मवीर भारती को 1988 में संगीत नाटक अकादमी (भारत की संगीत, नृत्य और नाटक की राष्ट्रीय अकादमी) द्वारा नाटक लेखन (हिंदी) के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। धर्मवीर भारती का जन्म इलाहाबाद के एक कायस्थ परिवार में चिरंजी लाल और चंदा देवी के घर हुआ था। पिता की जल्दी मृत्यु के बाद परिवार को काफी आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। धर्मवीर भारती की एक बहन थीं, डॉ. वीरबाला। धर्मवीर भारती ने 1946 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. किया और हिंदी में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने के लिए चिंतामणि घोष पुरस्कार जीता। इस दौर में धर्मवीर भारती ने अभ्युदय और संगम पत्रिकाओं के उप-संपादक के रूप में काम किया। उन्होंने 1954 में डॉ. धीरेंद्र वर्मा के मार्गदर्शन में सिद्ध साहित्य विषय पर अपनी पीएचडी पूरी की और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिंदी के लेक्चरर नियुक्त हुए। 1950 का दशक भारती के जीवन का सबसे रचनात्मक दौर था, इस दौर में उन्होंने कई उपन्यास, नाटक, कविताएं, निबंध और आलोचनात्मक रचनाएं लिखीं। 1960 में वे टाइम्स ऑफ इंडिया (बेनेट कोलमैन एंड कंपनी) ग्रुप की लोकप्रिय हिंदी साप्ताहिक पत्रिका धर्मयुग के मुख्य संपादक नियुक्त हुए। बॉम्बे (मुंबई) में रहते हुए #DharamvirBharati 1987 तक धर्मयुग के संपादक रहे। यह पत्रिका देश की सबसे लोकप्रिय हिंदी साप्ताहिक पत्रिका बन गई और हिंदी पत्रकारिता में नई ऊंचाइयों पर पहुंची। धर्मवीर भारती ने धर्मयुग के माध्यम से अनेक नामचीन पत्रकार और लेखक पैदा किए और नए लेखकों, पत्रकारों, कवियों आदि को प्रकाशित कर प्रोत्साहित किया और उन्हें पहचान दिलाई। फील्ड रिपोर्टर के तौर पर धर्मवीर भारती ने व्यक्तिगत रूप से 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध (जिसमें भारत ने प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में बांग्लादेश का निर्माण कराया) की कवरेज की।
यहां प्रस्तुत हैं धर्मवीर भारती के कुछ पठनीय, विचारणीय उद्धरण
एक नशा होता है अंधकार के गरजते महासागर की चुनौती स्वीकार करने का, पवर्ताकार लहरों से खाली हाथ जूझने का, अनमापी गहराइयों में उतरते जाने का और फिर अपने आप को सारे खतरों में डालकर आस्था के, पर्काश के, सत्य के, मयार्दा के, कुछ कणों को बटोर कर, बचा कर, धरातल तक ले जाने का, इस नशे में इतनी गहरी वेदना और इतना तीखा सुख घुला-मिला रहता है कि उसके आस्वादन के लिए मन बेबस हो उठता है. (अंधायुग की भूमिका में)।
कैफ बरदोश बादलों को ना देख, बेखबर तू कुचल न जाये कहीं।
बादशाहों की मुअत्तर ख्वाबगाहों में कहाँ, वह मजा जो भीगी-भीगी घास पर सोने में है,
मुतमइन बेफिक्र लोगों की हँसी में भी कहाँ, लुत्फ जो एक-दूसरे को देख कर रोने में है।
ऐसे अवसरों पर जब मनुष्य को गम्भीरतम उत्तरदायित्व सौंपा जाता है तब स्वभावतः आदमी के चरित्र में एक विचित्र-सा निखार आ जाता है।
जब भावना और सौन्दर्य के उपासक को बुद्धि और वास्तविकता की ठेस लगती है तब वह सहसा कटुता और व्यंग्य से उबल उठता है।
नारी, तुम नारी बनकर इस संसार में बहा देती हो प्रेम की धारा और प्यारे शिशु उसमें जल-क्रीड़ा करते हैं। जीवन दुःखमय है, पर प्रेम की यह छाया उसमें भर देती है सुख की ज्योति। मुझे निर्वाण नहीं चाहिए। मैं मनुष्य को सुनाऊँगा यह प्रेम का संदेश, मैं बताऊँगा प्रेम का, करुणा का वह देश, जहाँ के कण-कण में निर्वाण बसेगा, मुझे निर्वाण नहीं चाहिए।
वे क्यों रोते हैं? क्यों टूटते हैं? अपनी जिंदगी को, अपने रहन-सहन को, अपनी व्यवस्था को बदलते क्यों नहीं?
हरेक आदमी जिंदगी से समझौता कर लेता है किन्तु मैंने जिंदगी से समर्पण कराकर उसके हथियार रख लिए हैं।
हिंदू नारी इतनी असहाय होती है, उसे पति से, पुत्र से, सभी से इतना लांछन, अपमान और तिरस्कार मिलता है कि पूजा पाठ न हो तो पशु बन जाए। पूजा पाठ ने ही हिंदू नारी का चरित्र इतना ऊँचा रखा है।
जिस समय परीक्षकों के घर में पारिवारिक कलह हो, मन में अंतद्वंद्व हो या दिमाग में फितूर हो, उस समय उन्हें कॉपियाँ जांचने से अच्छा शरणस्थल नहीं मिलता। अपने जीवन की परीक्षा में फेल हो जाने की खीझ उतारने के लिए लड़कों को फेल करने के अलावा कोई अच्छा रास्ता ही नहीं है।
दुख अपनी पूरी चोट करने के वक्त अक्सर आदमी की आत्मा और मन को क्लोरोफार्म सुंघा देता है। चंदर कुछ भी सोच नहीं पा रहा था। संज्ञा-हत, नीरव, निश्चेष्ट ..।
जैसे हँसते-हँसते आदमी की प्रसन्नता थक जाती है, वैसे ही कभी-कभी रोते-रोते आदमी की उदासी थक जाती है और आदमी करवट बदलता है, ताकि हँसी की छाँह में कुछ विश्राम कर फिर वह आँसुओं की कड़ी धूप में चल सके।
दर्द इंसान के यकीदे (विश्वास) को और मजबूत न कर दे, आदमी के कदमों को और ताकत न दे, आदमी के दिल को ऊँचाई न दे तो इंसान क्या
कभी-कभी थोड़ा पलायन बहुत स्वस्थ होता है।
मैं उस मृत्यु के बारे में अक्सर सोचता हूँ जो क्षण-क्षण घटित हो रही है, हम में, तुम में, सब में।
लिखना चाहे जितने विशिष्ट ढंग से, लेकिन जीना एक अति सामान्य मनुष्य की तरह।
वस्तुतः यह सारा जीवन रसमय अनुभूतियों की सार्थक शृंखला न होकर, असंबद्ध क्षणों की भँवर है, जिसकी कोई दिशा नहीं।
कोई जरूरत नहीं कि कथाकार कहानी के अंत में पाठक पर आस्था थोप ही दे।
मृत्यु शायद किसी एक अमंगल क्षण में घटित होने वाली विभीषिका नहीं है। वह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।
जिंदगी को फूलों से तोलकर, फूलों से मापकर फेंक देने में कितना सुख है।
मैं उस मृत्यु की चिंता नहीं करता जो अकस्मात झटके से सांसों की डोर को तोड़ देगी। मैं उस मृत्यु के बारे में अक्सर सोचता हूँ जो क्षण-क्षण घटित हो रही है, हममें, तुममें, सबमें।
शिखरों की ऊँचाई कर्म की नीचता का परिहार नहीं करती।
डरने में उतनी यातना नहीं है जितनी वह होने में जिससे सबके सब केवल भय खाते हों।
सचाई कहाँ है, मैं आज तक नहीं समझ पाया।
सपने में बड़ा उल्लास है, सुंदर भी है, रहस्यमय भी है। यही सपने का अर्थ है।
हिंदी की समकालीन समीक्षा में बार-बार जो नवलेखन से अनास्था की शिकायत की जाती है, दुर्भाग्य से उसकी प्रकृति बहुत कुछ बहेलिया-विप्र के शाप जैसी है।
दुनिया की कोई भाषा नहीं जो पृथक व्यक्तियों के निगूढ़तम मर्म के बीच वास्तविक सेतु का काम कर सके।
रिस्ती – सी यादों में पिरा-पिरा उठना, मन का कोना-कोना,
बरसों के बाद उसी सूने से आंगन में, जाकर चुपचाप खड़े होना। -धर्मवीर भारती
A brief introduction to and noteworthy quotes by Dharamvir Bharati—the eminent Hindi poet, writer, playwright, journalist, social thinker, and editor of Dharmayug