
30 अगस्त 2006 को अगौजा, गीजा, मिस्र में मिस्र के विश्व विख्यात लेखक, उपन्यासकार, पटकथाकार, कहानीकार, पत्रकार नागुइब महफूज (नागुइब महफूज अब्देलअजीज इब्राहिम अहमद अल-बाशा, जन्म 11 दिसंबर 1911 काहिरा, मिस्र के खेदीवेट) का निधन हुआ। नागुइब महफूज को 1988 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। नागुइब महफूज को पुरस्कार देते हुए स्वीडिश अकादमी ने उन्हें एक लेखक बताया जिन्होंने अपनी बारीकियों से भरी रचनाओं, जो कभी साफ-साफ यथार्थवादी होती थीं, तो कभी दिलचस्प ढंग से अस्पष्ट, के जरिए एक ऐसी मिस्र की कहानी कहने की कला विकसित की जो पूरी मानवता पर लागू होती है। महफूज को ताहा हुसैन के साथ मिस्र के साहित्य में अस्तित्ववाद के विषयों को तलाशने वाले शुरुआती समकालीन लेखकों में से एक माना जाता है। नागुइब महफूज साहित्य का नोबेल पुरस्कार जीतने वाले एकमात्र मिस्र के लेखक हैं। उन्होंने 1930 के दशक से 2004 तक अपने 70 साल के करियर में 35 उपन्यास, 350 से कहानियां, 26 पटकथाएँ, मिस्र के अखबारों के लिए सैकड़ों ओप-एड कॉलम और सात नाटक लिखे। यथार्थवाद के साथ ही #NaguibMahfouz के लेखन में प्रगतिशीलता भी झलकती है जिससे कट्टरपंथी और यथास्थितिवादी उनसे चिड़े रहते थे। महफूज के सभी उपन्यास मिस्र पर आधारित हैं, और उनमें हमेशा गली (लेन) की अवधारणा का जिक्र होता है जो दुनिया का एक छोटा रूप है। उनकी सबसे मशहूर रचनाओं में द काहिरा ट्रिलॉजी और चिल्ड्रन ऑफ गेबेलावी शामिल हैं। महफूज की कई रचनाओं पर मिस्र और अंतरराष्ट्रीय फिल्में बनी हैं, जिससे वह सबसे ज्यादा फिल्मों में ढाले गए मिस्र के लेखकों में से एक बन गए। महफूज के साहित्य को यथार्थवादी साहित्य की श्रेणी में रखा जाता है, फिर भी इसमें अस्तित्ववादी विषय भी मिलते हैं।
महफूज को जब 1988 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला तब वे यह पुरस्कार पाने वाले एकमात्र अरब लेखक थे। पुरस्कार मिलने पर नागुइब महफूज ने कहा था, नोबेल पुरस्कार ने मुझे जिंदगी में पहली बार यह एहसास कराया है कि मेरे साहित्य की सराहना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो सकती है। मेरे साथ अरब जगत ने भी नोबेल जीता है। मेरा मानना है कि अंतरराष्ट्रीय दरवाजे खुल गए हैं और अब से पढ़े-लिखे लोग अरब साहित्य पर भी ध्यान देंगे। हम इस पहचान के हकदार हैं।
भारतीय ब्रिटिश लेखक मशहूर उपन्यास सलमाल रुश्दी के द सैटेनिक वर्सेज के प्रकाशन पर उठे विवाद के बाद महफूज के उपन्यास चिल्ड्रन ऑफ गेबेलावी को लेकर विवाद फिर से शुरू हो गया। इसके बाद महफूज को जान से मारने की धमकियां मिलने लगीं, जिनमें मिस्र में जन्मे अंधे शेख उमर अब्देल-रहमान की धमकी भी शामिल थी। महफूज को पुलिस सुरक्षा दी गई, लेकिन 14 अक्टूबर 1994 को एक चरमपंथी काहिरा में महफूज के घर के बाहर 82 वर्षीय उपन्यासकार की गर्दन पर चाकू मारकर हमला करने में सफल रहा। महफूज बच तो गए, लेकिन उनके दाहिने हाथ की नसें हमेशा के लिए क्षतिग्रस्त हो गईं। सोलह लोगों पर सैन्य अदालत में मुकदमा चलाया गया, जिनमें से दो को मौत की सजा सुनाई गई और बाद में फांसी दे दी गई। इस घटना के बाद महफूज दिन में कुछ मिनटों से ज्यादा नहीं लिख पाते थे और नतीजतन उन्होंने कम रचनाएँ कीं। इसके बाद वे हमेशा अंगरक्षकों की सुरक्षा में रहे। चिल्ड्रन ऑफ गेबेलावी को 2006 में मिस्र में अहमद कमाल अबुल-मगद की प्रस्तावना के साथ यह उपन्यास प्रकाशित हुआ।
यहां पेश हैं नगीब महफूज के कुछ प्रेरक, विचारोत्तेजक उद्धरण
डर मौत को नहीं रोकता। यह जिंदगी को रोकता है।
घर वह जगह नहीं है जहाँ आप पैदा हुए थे, घर वह जगह है जहाँ भागने की आपकी सारी कोशिशें खत्म हो जाती हैं।
आप किसी व्यक्ति के जवाबों से बता सकते हैं कि वह चतुर है या नहीं। आप किसी व्यक्ति के सवालों से बता सकते हैं कि वह बुद्धिमान है या नहीं।
भावुक दिल और शक करने वाला दिमाग होना बहुत तकलीफदेह होता है।
जहाँ तक जिंदगी के दुखों की बात है, हमारा प्यार उन्हें हरा देगा। प्यार सबसे असरदार इलाज है। आपदाओं की दरारों में, खुशी हीरे की तरह छिपी होती है, इसलिए आइए हम अपने अंदर प्यार की समझ पैदा करें।
पागलपन बुद्धिमानी की चरम सीमा है।
अगर जिंदगी का कोई मतलब नहीं है, तो हम इसका कोई मतलब क्यों नहीं बनाते?
हमेशा प्रार्थना करने, उपवास रखने और नमाज की चटाई पर सिर टेकने से कहीं ज्यादा जरूरी है कि हम अपने साथी इंसानों के साथ अच्छा व्यवहार करें।
क्या ऐसा हो सकता है कि हमारे पुराने प्यार का दर्द अभी भी इस पुराने दिल के साथ खेल रहा हो, जो अपनी मौत के इतने करीब है?
सभी लोग घने पत्तों वाले पेड़ की छाया में पनाह लेते हैं, लेकिन जब सर्दियाँ उसे पत्तों से खाली कर देती हैं, तो वे बिना किसी पछतावे के उसे छोड़ देते हैं।
ऋषियों ने कहा है कि कोई व्यक्ति तब तक इंसान कहलाने के लायक नहीं है, जब तक वह अपनी वासनाओं और भावनाओं पर काबू नहीं पा लेता।
थोड़ा-बहुत अंधविश्वास मन को तथ्यों और कठोर विज्ञान के बोझ से राहत देता है।
सूरज पश्चिमी क्षितिज की ओर झुक रहा था, जहाँ परछाइयों का अंतहीन साम्राज्य था। पवित्र नील नदी की सतह पर उसकी फीकी पड़ती किरणों की थरथराहट में मौत की सिहरन महसूस हो रही थी।
जिंदगी ने मेरे दुखों का मजाक उड़ाया, उससे मिले प्यार ने मुझे दर्द और निराशा की बीमारी से आजाद कर दिया।
काफी समय तक उसके बारे में कहानियाँ फैलती रहीं। लेकिन अंततः लोग उन्हें सुनाते-सुनाते थक गए और वे समय के मलबे के नीचे गुमनामी की कब्रों में दफन हो गईं।
उसने जो कुछ भी बनाया है, उससे प्यार करना ही रचयिता की संतुष्टि है।
बदलाव के अलावा दुनिया में कोई सच्चाई नहीं है।
इंसानी शरीर से बेहतर और कोई चीज दुख भरी जिंदगी के असर को इतनी साफ-साफ नहीं दिखाती।
सिर्फ गरीब लोग ही सम्मान के बोझ तले दबे होते हैं।
दिल राजों की जगह है।
पता है मुझे किस बात से डर लगता है? कि भगवान हमसे तंग आ चुके हैं।
अभिव्यक्ति की आजादी को पवित्र माना जाना चाहिए और विचारों को सिर्फ दूसरे विचारों से ही सुधारा जा सकता है।
खुशकिस्मत है वह इंसान जो खुद को समर्पित कर सकता है।
मुझे जिंदगी और लोगों पर भरोसा है। जब तक मुझे उनके ऊँचे आदर्श सही लगते हैं, मैं उनका समर्थन करना अपना फर्ज समझता हूँ। साथ ही, जो आदर्श मुझे गलत लगते हैं, उनके खिलाफ आवाज उठाना भी मैं जरूरी समझता हूँ, क्योंकि बगावत से पीछे हटना देशद्रोह जैसा होगा। -नगीब महफूज
Thought-provoking quotes from Naguib Mahfouz, the first writer from the Arab world to win the Nobel Prize
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