18 जुलाई 1922 को सिनसिनाती, ओहियो में थॉमस सैमुअल कुह्न का जन्म हुआ। थॉमस कुह्न विज्ञान के अग्रणी अमेरिकी इतिहासकार और दार्शनिक बने। उनकी 1962 की किताब द स्ट्रक्चर ऑफ साइंटिफिक रिवोल्यूशन्स (वैज्ञानिक क्रांतियों की संरचना) से एकेडमिक और आम लोग बहुत प्रभावित हुए। इस किताब ने पैराडाइम शिफ्ट (सोचने के नजरिए में बड़ा बदलाव) शब्द को लोकप्रिय बनाया, यह बाद में अंग्रेजी भाषा का एक मुहावरा बन गया। कुह्न ने वैज्ञानिक ज्ञान की प्रगति के बारे में कई बातें कहीं, जैसे कि वैज्ञानिक क्षेत्रों में समय-समय पर पैराडाइम शिफ्ट होते हैं, न कि वे सिर्फ एक सीधी और लगातार दिशा में आगे बढ़ते हैं और ये पैराडाइम शिफ्ट समझने के ऐसे नए तरीके खोलते हैं जिन्हें वैज्ञानिकों ने पहले कभी सही नहीं माना होता और यह कि किसी भी समय वैज्ञानिक सच को सिर्फ निष्पक्ष (ऑब्जेक्टिव) पैमानों से तय नहीं किया जा सकता, बल्कि इसे वैज्ञानिक समुदाय की आम सहमति से परिभाषित किया जाता है। आपस में मुकाबला करने वाले पैराडाइम अक्सर एक-दूसरे से पूरी तरह अलग या अतुलनीय होते हैं, यानी, #ThomasKuhn की मान्यताओं और शब्दों में कोई सीधा मेल नहीं होता। इसलिए, विज्ञान की हमारी समझ कभी भी पूरी तरह से सिर्फ निष्पक्षता पर निर्भर नहीं हो सकती। विज्ञान को व्यक्तिपरक (सब्जेक्टिव) नजरिए को भी ध्यान में रखना चाहिए, क्योंकि सभी निष्पक्ष निष्कर्ष आखिरकार शोधकर्ताओं और इसमें शामिल लोगों की व्यक्तिपरक सोच या दुनिया को देखने के नजरिए पर आधारित होते हैं।
थॉमस कुह्न का कहना था, किसी पैराडाइम के प्रति प्रतिबद्धता के साथ समस्याओं को हल करने के मकसद से प्रयोग करने और डेटा इकट्ठा करने के बारे में कुह्न कहते हैं कि प्रयोगशाला में वैज्ञानिक जो काम और माप करते हैं, वे अनुभव से अपने-आप मिलने वाली चीजें नहीं हैं, बल्कि मुश्किल से इकट्ठा की गई चीजें हैं। वे ऐसी चीजें नहीं हैं जिन्हें वैज्ञानिक देखता है, कम से कम तब तक तो नहीं जब तक उसका शोध काफी आगे न बढ़ जाए और उसका ध्यान पूरी तरह केंद्रित न हो जाए। बल्कि वे ज्यादा बुनियादी धारणाओं के ठोस संकेत होते हैं, और इसलिए उन्हें सामान्य शोध में बारीकी से जांचने के लिए चुना जाता है क्योंकि वे किसी स्वीकृत पैराडाइम को बेहतर ढंग से समझने और आगे बढ़ाने का मौका देते हैं। उस तात्कालिक अनुभव से कहीं ज्यादा स्पष्ट रूप से, जिससे वे आंशिक रूप से निकले होते हैं, ये काम और माप पैराडाइम से तय होते हैं। विज्ञान प्रयोगशाला में होने वाले हर तरह के प्रयोगों या बदलावों से नहीं निपटता। इसके बजाय, यह उन प्रयोगों को चुनता है जो किसी पैराडाइम और उस तात्कालिक अनुभव के मिलान के लिए जरूरी होते हैं, जिसे उस पैराडाइम ने आंशिक रूप से तय किया होता है। नतीजतन, अलग-अलग नजरिए (पैराडाइम) वाले वैज्ञानिक प्रयोगशाला में अलग-अलग तरह के ठोस प्रयोग करते हैं। उन्होंने थ्योरी चुनने के आधार बताए,
सटीक, प्रयोग और अवलोकन के आधार पर सही और पर्याप्त।
संगत, अंदर से सुसंगत, और साथ ही दूसरी थ्योरीज के साथ भी मेल खाने वाली।
व्यापक दायरा, थ्योरी का असर उस दायरे से आगे तक जाना चाहिए जिसके लिए उसे शुरू में बनाया गया था।
सरल, सबसे आसान व्याख्या, जो मुख्य रूप से श्ओकम के रेजरश् (व्बबंउश्े तं्रवत) के सिद्धांत जैसी हो।
फलदायी, थ्योरी से नई घटनाओं या घटनाओं के बीच नए संबंधों का पता चलना चाहिए।
थॉमस कुह्न को 1954 में गुगेनहाइम फेलो चुना गया, 1963 में अमेरिकन एकेडमी ऑफ आर्ट्स एंड साइंसेज का सदस्य बनाया गया। 1974 में अमेरिकन फिलॉसॉफिकल सोसाइटी के लिए चुना गया।, 1979 में यूनाइटेड स्टेट्स नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज के लिए चुना गया और 1982 में हिस्ट्री ऑफ साइंस सोसाइटी ने उन्हें जॉर्ज सार्टन मेडल से सम्मानित किया। 1983 में उन्हें सोसाइटी फॉर सोशल स्टडीज ऑफ साइंस से जॉन डेसमंड बर्नल अवार्ड मिला और 1990 में थॉमस कुह्न ब्रिटिश एकेडमी के कॉरेस्पोंडिंग फेलो बने। उन्हें कई मानद डॉक्टरेट की उपाधियाँ भी मिलीं। यहां पेश हैं थॉमस कुह्न के कुछ गंभीर उद्धरण
आपको जो जवाब मिलते हैं, वे आपके पूछे गए सवालों पर निर्भर करते हैं।
सभी बड़ी खोजें सोचने के पुराने तरीकों को तोड़ने से ही होती हैं।
हम दुनिया को अपनी थ्योरी के नजरिए से देखते हैं।
जो लोग नया पैराडाइम (सोचने का नया तरीका) बनाकर बड़ी कामयाबी हासिल करते हैं, वे अक्सर या तो बहुत युवा होते हैं या उस क्षेत्र में बिल्कुल नए होते हैं जिसका पैराडाइम वे बदलते हैं। ये वे लोग होते हैं जो सामान्य विज्ञान के पारंपरिक नियमों से पहले से बंधे नहीं होते, इसलिए वे आसानी से देख पाते हैं कि वे नियम अब काम के नहीं रहे और उनकी जगह लेने के लिए कोई नया तरीका सोच पाते हैं।
कोई व्यक्ति क्या देखता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह क्या देख रहा है और साथ ही इस बात पर भी कि उसके पिछले देखने और समझने के अनुभव ने उसे क्या देखना सिखाया है।
विज्ञान में हर जरूरी विचार शुरू में अजीब लगता है।
विज्ञान अपनी निष्पक्षता में पूरी तरह स्वतंत्र नहीं था यह इतिहास, समाज और वैज्ञानिकों के पूर्वाग्रहों से प्रभावित था।
एक पैराडाइम से दूसरे पैराडाइम में बदलाव तर्क या निष्पक्ष अनुभव के दबाव में एक-एक कदम करके नहीं हो सकता। गेस्टाल्ट स्विच (अचानक नजरिए का बदलना) की तरह, यह बदलाव एक ही बार में (जरूरी नहीं कि एक पल में ही) होता है, या फिर बिल्कुल नहीं होता।
सामान्य विज्ञान, जिसमें ज्यादातर वैज्ञानिक अपना ज्यादातर समय बिताते हैं, इस धारणा पर आधारित है कि वैज्ञानिक समुदाय जानता है कि दुनिया कैसी है। सामान्य विज्ञान अक्सर बुनियादी नई खोजों को दबा देता है क्योंकि वे उसकी मूल मान्यताओं को चुनौती देती हैं।
विज्ञान में नई बात बड़ी मुश्किल से सामने आती है, उम्मीदों के माहौल में इसका विरोध होता है।
शायद, नए पैराडाइम के समर्थकों का सबसे आम दावा यह होता है कि वे उन समस्याओं को हल कर सकते हैं जिनकी वजह से पुराने पैराडाइम में संकट पैदा हुआ था।
विज्ञान के दार्शनिकों ने बार-बार दिखाया है कि डेटा के किसी खास समूह के आधार पर एक से ज्यादा थ्योरी बनाई जा सकती हैं।
जो व्यक्ति मौजूदा ज्ञान और तकनीक के आधार पर किसी समस्या को हल करने की कोशिश कर रहा है, वह बस यूं ही इधर-उधर नहीं देख रहा होता। वह जानता है कि वह क्या हासिल करना चाहता है, और उसी के हिसाब से अपने उपकरण बनाता है और अपने विचारों को दिशा देता है। अप्रत्याशित नई खोज तभी हो सकती है जब प्रकृति और अपने उपकरणों के बारे में उसकी उम्मीदें गलत साबित हों खोज करने का कोई और असरदार तरीका नहीं है।
विज्ञान के इतिहासकार यह दावा कर सकते हैं कि जब पैराडाइम बदलते हैं, तो उनके साथ दुनिया भी बदल जाती है। एक नए नजरिए (पैराडाइम) से प्रेरित होकर, वैज्ञानिक नए उपकरण अपनाते हैं और नई जगहों पर खोज करते हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि क्रांति के दौरान, वैज्ञानिक उन्हीं जगहों पर और उन्हीं जाने-पहचाने उपकरणों से नई और अलग चीजें देखते हैं जहाँ उन्होंने पहले भी देखा था। यह कुछ वैसा ही है जैसे पेशेवर समुदाय को अचानक किसी दूसरे ग्रह पर पहुँचा दिया गया हो, जहाँ जानी-पहचानी चीजें अलग नजरिए से देखी जाती हैं और उनके साथ अनजान चीजें भी जुड़ जाती हैं।
एक नजरिए को छोड़ने का फैसला हमेशा दूसरे नजरिए को अपनाने का फैसला भी होता है, और इस फैसले तक पहुँचने की प्रक्रिया में दोनों नजरियों की तुलना प्रकृति और एक-दूसरे से की जाती है।
क्रांतिकारी बदलाव के दौर में बातचीत हमेशा अधूरी ही होती है।
राजनीतिक क्रांतियों का मकसद राजनीतिक संस्थाओं को इस तरह बदलना होता है जिसकी वे संस्थाएँ खुद मनाही करती हैं। इसलिए उनकी सफलता के लिए एक तरह की संस्थाओं को छोड़कर दूसरी तरह की संस्थाएँ अपनानी पड़ती हैं, और इस बीच, समाज पूरी तरह से संस्थाओं द्वारा संचालित नहीं होता है।
सामान्य स्थितियों में, शोध करने वाला वैज्ञानिक कोई नया आविष्कारक नहीं बल्कि पहेलियाँ सुलझाने वाला होता है, और वह उन्हीं पहेलियों पर ध्यान केंद्रित करता है जिनके बारे में उसका मानना घ्घ्होता है कि उन्हें मौजूदा वैज्ञानिक परंपरा के दायरे में ही बताया और सुलझाया जा सकता है।
सभी संकट एक नजरिए के धुंधले पड़ने और उसके परिणामस्वरूप सामान्य शोध के नियमों के ढीले पड़ने से शुरू होते हैं या अंत में, जिस स्थिति पर हम यहाँ सबसे ज्यादा ध्यान देंगे, वह यह है कि संकट का अंत एक नए नजरिए के उभरने और उसे अपनाने को लेकर होने वाली लड़ाई के साथ हो सकता है।
सामान्य विज्ञान का मकसद नई तरह की घटनाओं को सामने लाना नहीं होताय असल में, जो घटनाएँ मौजूदा दायरे में फिट नहीं बैठतीं, वे अक्सर दिखाई ही नहीं देतीं। वैज्ञानिक आम तौर पर नए सिद्धांतों का आविष्कार करने का लक्ष्य भी नहीं रखते, और वे अक्सर दूसरों द्वारा खोजे गए सिद्धांतों को स्वीकार नहीं करते।
सामान्य विज्ञान का मकसद तथ्यों या सिद्धांतों में नयापन लाना नहीं होता और, सफल होने पर, उसे ऐसा कुछ मिलता भी नहीं है।
यह बात तेजी से साफ होती जा रही है कि हमारे समय के संकट ही उस क्रांति के लिए जरूरी प्रेरणा हैं जो अभी चल रही है। और एक बार जब हम प्रकृति की बदलने वाली ताकतों को समझ लेते हैं, तो हम देखते हैं कि वह हमारी मजबूत सहयोगी है, न कि कोई ऐसी ताकघ्त जिससे डरने या जिसे दबाने की जरूरत हो।
व्याख्या करने वाले के बजाय, जो वैज्ञानिक नए नजरिए को अपनाता है, वह उल्टी छवि दिखाने वाले लेंस पहनने वाले व्यक्ति जैसा होता है।
लगभग हमेशा, नए नजरिए के ये बुनियादी आविष्कार करने वाले लोग या तो बहुत युवा होते हैं या उस क्षेत्र में बिल्कुल नए होते हैं जिसका नजरिया वे बदलते हैं।
शाब्दिक और लाक्षणिक, दोनों ही अर्थों में, उल्टी छवि दिखाने वाले लेंस पहनने का आदी व्यक्ति देखने के नजरिए में क्रांतिकारी बदलाव से गुजरता है। -थॉमस कुह्न
All major discoveries arise from breaking old ways of thinking—a profound and thought-provoking quote by the pioneering American historian and philosopher Thomas Kuhn, author of The Structure of Scientific Revolutions
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