
विवेकानंद प्रसिद्ध क्रांतिकारी भूपेंद्रनाथ दत्त के छोटे भाई थे। भूपेंद्रनाथ अच्छे लेखक, चिंतक समाजशास्त्री भी थे। अपने युवाकाल में वे युगांतर आंदोलन से नजदीकी से जुड़े थे। अपनी गिरफ्तारी तक वे युगांतर पत्रिका के संपादक थे। वे एक अच्छे लेखक थे। 12 जनवरी 1863 को नरेंद्रनाथ दत्त यानी स्वामी विवेकानंद का जन्म कलकत्ता में हुआ। कुछ बड़े होने पर उनका झुकाव आध्यात्म की ओर हुआ। युवावस्था में वे कई संतों, आध्यात्मिकों के संपर्क में आए और 1881 में विवेकानंद की मुलाकात रामकृष्ण परमहंस से हुई फिर वे उनके शिष्य बन गये। अपने गुरु रामकृष्ण से प्रभावित होकर उन्होंने 25 साल की उम्र में संन्यास ले लिया। संन्यास लेने के बाद उनका नाम स्वामी विवेकानंद पड़ा। विवेकानंद रामकृष्ण के प्रमुख शिष्य, सन्यासी, दार्शनिक, लेखक और आध्यात्मिक व्यक्ति बने। 1886 में रामकृष्ण परमहंस का आखिरी समय बहुत कष्ट में गुजरा। वे गले के कैंसर के शिकार थे। उनका निधन हो गया। विवेकानंद ने 1897 में कलकत्ता में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इसके एक साल बाद उन्होंने गंगा नदी के किनारे बेलूर में रामकृष्ण मठ की स्थापना की।
04 जुलाई 1902 को महज 39 वर्ष की अल्पायु में विवेकानंद का कलकत्ता के करीब हावड़ा स्थिति बेलूर मठ में निधन हो गया, वे मधुमेह (डायबिटीज) के मरीज थे। विवेकानंद मानते थे कि समाज की दशा दिशा को युवा बदल सकते हैं। उन्हें भरोसा था कि युवा अपनी कड़ी मेहनत, समर्पण और आध्यात्मिक शक्ति के माध्यम से भारत के भाग्य को बदल सकते हैं। युवाओं के लिए उनका संदेश था, मैं चाहता हूं कि लोहे की मांसपेशियां और स्टील की नसें हों, जिसके अंदर वैसा ही दिमाग रहता है जिससे वज्र बनता है। इस तरह के संदेशों के माध्यम से उन्होंने युवाओं में बुनियादी मूल्यों को स्थापित करने की कोशिश की। हिंदू धर्म में तब बहुत बुराइयां थीं। कथनी और करनी में भारी भेद था, विसंगतियां थीं। हिंदू धर्म की वर्णव्यवस्था में विवेकानंद चौथे वर्ण यानी शूद्र वर्ग में आते थे, वे कायस्थ जाति के थे, जो तथाकथित उच्च वर्ण वालों के अत्याचारों से त्रस्त थे। इसकी व्यापक चर्चा और इसका विरोध विवेकानंद ने अपने वक्तव्यों में किया है लेकिन हिंदू धर्म के ध्वजाधारी कभी उसकी चर्चा नहीं करते। उन्हें गर्व इस बात का है कि उन्होंने शिकागो की धर्म संसद से हिंदू धर्म को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। विश्व धर्म संसद 11 सितंबर 1893 को हुई अमेरिकी नगर शिकागो में। जबकि हिंदू धर्म के तथाकथित ठेकेदारों ने विवेकानंद को हिंदू धर्म के प्रतिनिधि के रूप में शिकागो की धर्म संसद में जाने देने की अनुमति नहीं दी थी। बनारस में विवेकानंद को टिकने नहीं दिया था पंडितों ने। जबकि आज दक्षिणपंथी हिंसक हिंदू गिरोह #SwamiVivekananda पर गर्व करने का नाटक करता है। भाजपा, आरएसएस विवेकानंद के बहाने अपनी सांप्रदायिक, फासिस्ट राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ा रही है। यहां जानिए विवेकानंद के कुछ विचार –
एक विचार को अपनाओ। उस एक विचार को ही अपना जीवन बना लो उसी के सपने देखो उसी के बारे में सोचो उसी विचार के सहारे जियो। अपने दिमाग, शरीर, मांसपेशियों, नसों शरीर के हर हिस्से को उस विचार से भर लो और बाकी सभी विचारों को छोड़ दो। यही सफलता का रास्ता है और इसी तरह महान आध्यात्मिक लोग बनते हैं।
तुम्हें अंदर से बाहर की ओर विकसित होना है। कोई तुम्हें सिखा नहीं सकता, कोई तुम्हें आध्यात्मिक नहीं बना सकता।
दिल और दिमाग के बीच टकराव होने पर, अपने दिल की सुनो।
सबसे बड़ा धर्म है अपने स्वभाव के प्रति सच्चा रहना। खुद पर भरोसा रखो।
सबसे बड़ा पाप है खुद को कमजोर समझना।
जो भी चीज तुम्हें शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक रूप से कमजोर बनाती है, उसे जहर की तरह त्याग दो।
हम वही हैं जो हमारे विचारों ने हमें बनाया है, इसलिए सोच-समझकर विचार करो। शब्द गौण हैं। विचार जीवित रहते हैं, वे दूर तक जाते हैं।
आजाद होने की हिम्मत करो, जहाँ तक तुम्हारे विचार ले जाएँ वहाँ तक जाने की हिम्मत करो, और उसे अपने जीवन में उतारने की हिम्मत करो।
उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।
वही लोग जीते हैं जो दूसरों के लिए जीते हैं।
प्यार विस्तार है, स्वार्थ संकुचन है। इसलिए प्यार ही जीवन का एकमात्र नियम है। जो प्यार करता है वही जीता है, जो स्वार्थी है वह मर रहा है। इसलिए प्यार के लिए प्यार करो, क्योंकि यह जीवन का एकमात्र नियम है, ठीक वैसे ही जैसे तुम जीने के लिए साँस लेते हो।
किसी भी चीज से डरो मत। तुम अद्भुत काम करोगे। निडरता ही एक पल में स्वर्ग ला सकती है।
जब तक तुम खुद पर विश्वास नहीं करते, तब तक तुम ईश्वर पर विश्वास नहीं कर सकते।
कुछ महसूस मत करो, कुछ मत जानो, कुछ मत करो, कुछ मत रखो, सब कुछ ईश्वर को सौंप दो और पूरी तरह से कहो, तेरी इच्छा पूरी हो। यह बंधन केवल हमारा एक सपना है। जागो और इसे छोड़ दो।
तुम फुटबाल के जरिये स्वर्ग के ज्यादा निकट होगे, बजाय गीता का अध्ययन करने के।
जो सत्य है, उसे साहसपूर्वक निर्भीक होकर लोगों से कहो, उससे किसी को कष्ट होता है या नहीं, इस ओर ध्यान मत दो। दुर्बलता को कभी प्रश्रय मत दो। सत्य की ज्योति बुद्धिमान मनुष्यों के लिए यदि अत्यधिक मात्रा में प्रखर प्रतीत होती है, और उन्हें बहा ले जाती है, तो ले जाने दो, वे जितना शीघ्र बह जाएँ उतना अच्छा ही हैं।
पीड़ितों की सेवा के लिए आवश्यकता पड़ने पर हम अपने मठ की भूमि तक भी बेच देंगे। हजारों असहाय नर नारी हमारे नेत्रों के सामने कष्ट भोगते रहें और हम मठ में रहें, यह असंभव है। हम सन्यासी हैं, वृक्षों के नीचे निवास करेंगे और भिक्षा मांगकर जीवित रह लेंगे।
जब तक करोड़ों लोग भूखे और अज्ञानी रहेंगे, मैं उस प्रत्येक व्यक्ति को विश्वासघाती मानूंगा जो उनकी कीमत पर शिक्षित हुआ है और उनकी ओर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देता है।
किसी दिन, जब आपके सामने कोई समस्या ना आए, आप सुनिश्चित हो सकते हैं कि आप गलत मार्ग पर चल रहे हैं।
तुम्हें कोई पढ़ा नहीं सकता, कोई आध्यात्मिक नहीं बना सकता। तुमको सब कुछ खुद अंदर से सीखना हैं। आत्मा से अच्छा कोई शिक्षक नही हैं।
सत्य को हजार तरीकों से बताया जा सकता है, फिर भी हर एक सत्य ही होगा।
हम हिंदू भी नहीं है और वेदांतिक भी नहीं, असल में हम है छुआछूत पंथी। रसोई घर हमारा मंदिर है, पकाने का बर्तन हमारा उपास्य देवता है और मत छुओ ,मत छुओ, मंत्र है। समाज के इस कुसंस्कार को शीघ्र दूर करना होगा!
वह देश जहां करोड़ों व्यक्ति महुआ के फूल पर जिंदा रहते हैं और जहां दस लाख से ज्यादा साधू और कोई दस करोड़ ब्राह्मण हैं जो गरीबों का खून चूसते हैं,वह देश है या नर्क? वह धर्म हैं या शैतान का नृत्य?
विवेकानंद एक साधक, योगी के रूप में काम किया, उनकी प्रतिष्टा भी उसी में है लेकिन सवाल करना जरूरी है कि उनका समाज के लिए क्या योगदान है ? उत्तर यह हो सकता है कि उन्होंने विचार दिए। तो आप विचार कीजिए कि मौजूदा सत्ता पर काबिज दल क्या विवेकानंद के विचारों का अनुसरण करता है ? क्या रोटी, रोजी इत्यादि जीने के लिए जरूरी सुविधाएं सभी के लिए उपलब्ध नहीं होनी चाहिए ? सत्ता इस दिशा में क्या काम कर रही है ? गौर कीजिए और समाज की जरूरी समस्याओं पर सरकार से सवाल कीजिए। -स्वामी विवेकानंद


