23 जून 1928 को जर्सी सिटी, न्यू जर्सी में माइकल शारा का जन्म हुआ। माइकल शारा साइंस फिक्शन, स्पोर्ट्स फिक्शन और ऐतिहासिक फिक्शन लिखने वाले अमेरिकी लेखक के रूप में प्रसिद्ध हुए। माइकल शारा ने 1951 में रटगर्स यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया, जहाँ वे थीटा ची (थीटा ची, नॉर्विच यूनिवर्सिटी में गठित पुरुषों का एक अंतरराष्ट्रीय कॉलेज फ्रेटरनिटी (समूह) से जुड़े, और कोरियाई युद्ध से पहले 82वें एयरबोर्न डिवीजन में सार्जेंट के तौर पर सेवा की। 1950 के दशक में फिक्शन मैगजीन को साइंस फिक्शन कहानियाँ बेचने से पहले शारा एक शौकिया बॉक्सर और पुलिस अधिकारी रहे। तनाव और सिगरेट पीने की आदत के कारण 36 साल की कम उम्र में उन्हें दिल का दौरा पड़ा। वे पूरी तरह ठीक हो गए और बाद में फ्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी में साहित्य पढ़ाया, साथ ही फिक्शन लिखना भी जारी रखा। गेटिसबर्ग की लड़ाई पर आधारित उनके उपन्यास, द किलर एंजल्स को 1975 में फिक्शन के लिए पुलित्जर पुरस्कार मिला। 1988 में 5 मई को 59 साल की उम्र में दिल का दौरा पड़ने से शारा की मौत हो गई। शारा के बच्चे, जेफरी और लीला भी उपन्यासकार हैं। 1997 में जेफरी शारा ने सिविल वॉर फिक्शन में बेहतरीन काम के लिए वार्षिक माइकल शारा पुरस्कार शुरू किया, यह गेटिसबर्ग कॉलेज में दिया जाता है। माइकल शारा चूंकि फौज और पुलिस में रहे तो उसकी खूबियां और खामियां उनके लेखन में हैं। यहां प्रस्तुत हैं माइकल शारा के कुछ उद्धरण और उनके साहित्य से कुछ संवाद
एक अच्छा सैनिक बनने के लिए आपको सेना से प्यार करना होगा। लेकिन एक अच्छा अधिकारी बनने के लिए आपको उस चीज की मौत का आदेश देने के लिए तैयार रहना होगा जिसे आप प्यार करते हैं। यह करना बहुत मुश्किल काम है। किसी और पेशे में इसकी जरूरत नहीं होती। यही एक वजह है कि अच्छे अधिकारी बहुत कम होते हैं। हालाँकि अच्छे लोग बहुत सारे हैं।
मुझे यह बात सच में समझ नहीं आती। कभी समझ नहीं आई। जितना ज्यादा मैं इसके बारे में सोचता हूँ, उतना ही यह मुझे डराता है। वे किसी आदमी की आँखों में देखकर उसे गुलाम कैसे बना सकते हैं और फिर बाइबिल का हवाला कैसे दे सकते हैं?
आसमान में बैठा वह महान गोरा जोकर हम सभी को जन्म से ही बेवकूफी या गरीबी के लिए अभिशप्त कर देता है। धरती पर कोई भी दो चीजें बराबर नहीं होतीं और न ही उन्हें बराबर मौका मिलता है, चाहे वह पत्ता हो या पेड़।
असली त्रासदी के समय न तो आपको दर्द महसूस होता है, न खुशी और न ही नफरत, बस एक विशाल खालीपन और समय के ठहर जाने का एहसास होता है, जैसे काले अनंत की ओर बड़े दरवाजे खुल गए हों, और उस भयानक मैदान से एक बहुत बड़ा, जिसका कोई जवाब न हो, ऐसा सवाल उठ रहा हो।
और फिर भी अचानक, बहुत बुरी तरह, उसे वह सब फिर से चाहिए था, जैसा पहले हुआ करता था, हाथों में हाथ डाले, नशे में धुत और रात में सुरीले गीत गाते हुए, दोपहर में मौत के दृश्य और आने वाली सुबह में मौत के सपने, रात एक अजीब और कुछ समय के लिए चमकती हुई खुशी से भरी हुई, भरपूर पल, गर्म बारिश की बूंदों की तरह गिरते हुए घने सेकंड, एक के बाद एक कीमती रत्न की तरह।
धरती पर कोई भी चीज भगवान जैसी नहीं होती, सिवाय युद्ध के मैदान में मौजूद जनरल के।
ऐसे लोग क्यों होते हैं, जिन्हें दूसरे इंसान की मौत में मजा आता है?
अगर अमेरिका में लोग बराबर थे, पोलिश, अंग्रेज, चेक और अश्वेत, तो वे हर जगह बराबर थे, और असल में विदेशी जैसी कोई चीज नहीं थी, बस आजाद लोग और गुलाम थे।
शायद बात बस इतनी थी कि जब आप इसे शब्दों में ढालने की कोशिश करते हैं, तो आप इसे सही ढंग से बयां नहीं कर पाते, यह कभी वैसा नहीं लगता जैसा आपने सपना देखा था।
जिस आदमी पर गोली चली हो, वह एक नया यथार्थवादी बन जाता है और जब युद्ध आदर्शों का हो, तो आप एक यथार्थवादी से क्या कहेंगे?
दक्षिणी राज्यों की औरतें चाहती हैं कि उनके मर्द धार्मिक हों और थोड़े सनकी भी।
सिर्फ उस धातु के अंत से कहीं ज्यादा कुछ होना चाहिए और फिर सन्नाटा, फिर कीड़े-मकोड़े और कभी-कभी उसे यकीन होता था, लेकिन इस पल उसे बिल्कुल यकीन नहीं था, बंदूकों की आवाज के परे कुछ नहीं था.सन्नाटा भी नहीं, बस एक अंत।
दिल की बात यह थी कि आप इसे किसी दूसरी बीमारी की तरह मना या मजबूर नहीं कर सकते थे। इच्छाशक्ति का कोई मतलब नहीं था।
पिकेट ने लॉन्गस्ट्रीट से माफी मांगी और वहाँ से हट गया। पिकेट हमेशा किसी न किसी को चिढ़ाने वाली बात कहता रहता था, और उसे शायद ही कभी पता होता था कि क्यों, इसलिए उसका तरीका बस यही था कि समय-समय पर आम तौर पर माफी मांग ले और लोगों को बता दे कि उसकी नीयत अच्छी थी और फिर वहाँ से निकल जाए और अच्छे की उम्मीद करे। उसने माफी मांगी और चला गया, उसके घुंघराले बाल हिल रहे थे।
इतने सारे लोगों की मौत के लिए हम कभी तैयार नहीं होते, हमला करते समय आप कुछ भी रोककर नहीं रख सकते। आपको पूरी तरह से खुद को झोंक देना होता है। और फिर भी, अगर वे सब मारे जाते हैं, तो इंसान खुद से पूछता है, क्या यह सब सही था?
मैं तुम्हें आगाह करने की कोशिश कर रहा था। लेकिन, तुम्हारे पास कोई मकसद नहीं है। तुम्हारे और मेरे पास कोई मकसद नहीं है। हमारे पास सिर्फ सेना है। लेकिन अगर कोई सैनिक सिर्फ सैनिकों के लिए लड़ता है, तो वह कभी जीत नहीं सकता। मरने वाले तो सिर्फ सैनिक ही होते हैं। जिस इंसान पर गोली चली हो, वह असलियत को समझने वाला नया इंसान बन जाता है, और ऐसे इंसान से आप क्या कहेंगे, जब आपके पास देने के लिए सिर्फ एक सपना बचा हो?
यह आजाद जमीन है। यहाँ से लेकर प्रशांत महासागर तक। किसी को झुकना नहीं पड़ता। कोई शाही खानदान में पैदा नहीं हुआ है। यहाँ हम आपको आपके कामों से परखते हैं, न कि इस बात से कि आपके पिता कौन थे।