
28 अगस्त 1896 को ब्रिटिश भारत के उत्तर-पश्चिमी प्रांतों के गोरखपुर में रघुपति सहाय का जन्म हिंदू कायस्थ परिवार में हुआ। लेखन के लिए रघुपति सहाय ने फिराक गोरखपुरी नाम अपनाया। फिराक गोरखपुरी प्रसिद्ध, प्रभावशाली और बहुप्रतिष्ठित उर्दू लेखक, आलोचक और शायर बने। फिराक गोरखपुरी ने अपने समय के दिग्गज शायरों मुहम्मद इकबाल, यगाना चंगेजी, जिगर मुरादाबादी और जोश मलीहाबादी के बीच अपनी अलग पहचान बनाई। फिराक गोरखपुरी को प्रोविंशियल सिविल सर्विस (पीसीएस) और आगे इंडियन सिविल सर्विस (ब्रिटिश भारत में आईसीएस के लिए चुना गया लेकिन महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए उन्होंने इस्तीफा दे दिया, इस कारण फिराक गोरखपुरी को 18 महीने जेल में बिताने पड़े। बाद में वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य के लेक्चरर के तौर पर शामिल हुए। इसी दौर में फिराक गोरखपुरी ने अपनी ज्यादातर उर्दू कविताएँ लिखीं, जिनमें उनकी सबसे बेहतरीन रचना गुल-ए-नग्मा शामिल है। इसके लिए उन्हें भारत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार और 1960 में उर्दू के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। अपने जीवनकाल में #FiraqGorakhpuri को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन में रिसर्च प्रोफेसर और ऑल इंडिया रेडियो में प्रोड्यूसर एमेरिटस का पद मिला।
फिराक गोरखपुरी ने उर्दू की करीब-करीब हर विधा गजल, नज्म, रुबाई और कतआत लिखे। उन्होंने उर्दू कविता की एक दर्जन से ज्यादा किताबें, उर्दू गद्य की आधी दर्जन किताबें, हिंदी में साहित्यिक विषयों पर कई किताबें और साथ ही साहित्यिक और सांस्कृतिक विषयों पर अंग्रेजी गद्य की चार किताबें लिखीं। फिराक गोरखपुरी अरबी सहित अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे। उनके भतीजे अजय मानसिंह द्वारा लिखी गई उनकी जीवनी, फिराक गोरखपुरी – द पोएट ऑफ पेन एंड एक्स्टसी 2015 में रोली बुक्स द्वारा प्रकाशित की गई थी। इस किताब में उनके जीवन के किस्से और उनकी कुछ रचनाओं के अनुवाद शामिल हैं। फिराक गोरखपुरी को 1960 में उर्दू के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1968 में पद्म भूषण, 1968 में सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, 1969 में ज्ञानपीठ पुरस्कार (उर्दू साहित्य के लिए पहला ज्ञानपीठ पुरस्कार), 1970 में साहित्य अकादमी फेलोशिप और 1981 में गालिब अकादमी पुरस्कार मिला।
फिराक गोरखपुरी का निधन 3 मार्च 1982 को 85 वर्ष की आयु में हुआ। फिराक गोरखपुरी ने जीवन भर धर्मनिरपेक्षता के लिए संघर्ष किया और तत्कालीन सरकार द्वारा उर्दू को मुसलमानों की भाषा करार देने की कोशिशों का पुरजोर विरोध किया। फिराक को उर्दू से गहरा लगाव था और उन्होंने भारत तथा उपमहाद्वीप की सामूहिक भाषाई चेतना में उर्दू को बनाए रखने के महत्व पर जोर दिया। फिराक गोरखपुरी ने कहा, जुबान किसी कौम की मिल्कियत नहीं, जिसने सीखी, उसने कही (भाषा किसी खास समाज की बपौती नहीं है, जिसने इसे सीखा है, वही इसे बोलता है)।
फिराक गोरखपुरी के कुछ विचारोत्तेजक, प्रेरक उद्धरण यहां आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत हैं, पढ़िए, समझने का प्रयास कीजिए।
अवाम में और बड़े अदीब (विद्वान लेखक) में यह फर्क नहीं होता कि अवाम कम लफ्ज जानती है और अदीब जियादा लफ्ज जानता है। इन दोनों में फर्क यह होता है कि अवाम को अपने लफ्ज हर मौके पर याद नहीं आते। अवाम अपने लफ्जों को हैरत-अंगेज तौर पर मिला कर फिक्रे नहीं बना सकते, उन्हें जोरदार तरीके पर इस्तेमाल नहीं कर सकते, लेकिन अदीब अवाम ही के अल्फाज से ये सब कुछ कर के दिखा देता है।
उर्दू को मिटा देना हिंदी के लिए अच्छा नहीं है। हिंदी को मिटा देना उर्दू के लिए अच्छा नहीं है। हिंदी और उर्दू दोनों एक ही तस्वीर के दो रुख हैं।
किसी कौम को अहमक बनाना हो तो उस कौम के बच्चों को आसान और सहज लफ्जों के बदले जबड़ा तोड़ लफ्ज घुँटवा दीजिए। सब बच्चे अहमक हो जाएंगे।
कौम और कौमी जिंदगी मिट रही है और हम हैं कि हिंदी, हिंदी और उर्दू, उर्दू किए जा रहे हैं।
वो दिन आ जाएगा कि हिंदू तालिब-ए-इल्म अनीस को सबसे बड़ा शायर बताएगा और मुस्लमान तालिब-ए-इल्म तुलसी दास को अनीस से दस गुना बड़ा ठहराएगा। हिंदू तालिब-ए-इल्म उर्दू गजलों पर जान देगा और मुस्लमान तालिब-ए-इल्म महादेवी के नर्म, रसीले और दिल में उतर जाने वाले नग्मों की कसम खाएगा।
शाइरी का मकसद हम जो कुछ भी समझें उसका हकीकी मकसद बुलंद-तरीन विजदानी कैफियात और जमालियाती शुऊर पैदा करने के अलावा कुछ नहीं।
हमारी बोली एक जीती-जागती चीज है। अगर इसमें संस्कृत के वो लफ्ज भरे जाएंगे, जो कोई बोलता नहीं तो ये गाड़ी आगे नहीं बढ़ेगी। अब हिंदी और उर्दू वाले खु फैसला करें कि अगर हिंदी-उर्दू की लड़ाई में जीत आसान जबान की होगी तो जीत उर्दू की होगी या हिंदी की ?
उमूमन बुलंद इश्किया शायरी करने वाला शायर गैर-मामूली शिद्दत-ए-जज्बात-ओ-एहसासात के साथ आशिक भी होता है।
जिंदगी को दाखिली सेहत बख्शना फुनून-ए-लतीफा की अस्ल गरज-ओ-गायत है।
जो शख्स या जो जमाअत यह कहे कि सिर्फ हिंदी अदब ने हमारे कल्चर की सेवा की और उर्दू ने हमारे कल्चर को नुकसान पहुँचाया या सिर्फ उर्दू ने हमारे कल्चर की सेवा की और हिंदी ने हमारे कल्चर को नुकसान पहुँचाया, उस शख्स और जमाअत को कल्चर के मुताल्लिक राय देने का कोई हक नहीं है।
कोई समझे तो एक बात कहूँ, इश्क तौफीक (सौभाग्य) है गुनाह नहीं।
आने वाली नस्लें तुम पर रश्क करेंगी हमअस्रों, जब ये ख्याल आयेगा उनको, तुमने फिराक को देखा था।
जबान शुऊर का हाथ-पैर है।
रटे हुए लफ्जों से बड़ा अदब नहीं बना करता।
किताबों की दुनिया मुर्दों और जिंदों दोनों के बीच की दुनिया है।
वही शायरी अमर होती है, जिसमें आम बोलचाल के शब्द शामिल हों।
बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं, तुझे ऐ जिंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं।
बहसें छिड़ी हुई हैं हयात-ओ-ममात की
सौ बात बन गई है फिराक एक बात की
मुझ को मारा है हर इक दर्द ओ दवा से पहले
दी सजा इश्क ने हर जुर्म-ओ-खता से पहले
ये नर्म नर्म हवा झिलमिला रहे हैं चराग
तेरे खयाल की खुशबू से बस रहे हैं दिमाग
रुकी रुकी सी शब-ए-मर्ग खत्म पर आई
वो पौ फटी वो नई जिंदगी नजर आई
रस में डूबा हुआ लहराता बदन क्या कहना
करवटें लेती हुई सुब्ह-ए-चमन क्या कहना। -फिराक गोरखपुरी
Inspiring quotes and verses Sher by the legendary Urdu poet Raghupati Sahay Firaq Gorakhpuri

